सीता का त्याग, तप, ताप और राष्ट्रधर्म


 

सीतायण शृंखला आलेख
सीता का त्याग, तप, ताप और राष्ट्रधर्म
वाल्मीकि रामायण, कंब रामायणम्, कालिदास-कृत रघुवंश एवं अद्भुत रामायण के तुलनात्मक आलोक में




एक स्त्री, एक तप, एक राष्ट्र::भारतीय चेतना में सीता केवल राम की पत्नी नहीं हैं , वे स्वयं एक दर्शन हैं, एक तपश्चर्या हैं और एक राष्ट्रधर्म का जीवंत प्रतिमान हैं। जब हम सीता के त्याग की चर्चा करते हैं, तो वह त्याग किसी दुर्बलता से उपजा हुआ त्याग नहीं, बल्कि सायास चुना गया धर्म है। जब हम उनके तप और ताप की बात करते हैं, तो वह तप केवल वैयक्तिक कष्ट-सहन नहीं, समूचे राष्ट्र और समाज की मर्यादा की रक्षा के लिए स्वीकृत अग्निपथ है।

भिन्न-भिन्न कालखंडों में, भिन्न-भिन्न भाषाओं और भिन्न-भिन्न कवि-दृष्टियों से रचित रामकथा-परंपराओं ने सीता को भिन्न-भिन्न रंगों में चित्रित किया है — कहीं वे धैर्य की प्रतिमूर्ति हैं, कहीं वे प्रश्न पूछने वाली प्रज्ञा हैं, कहीं वे प्रकृति-पुत्री हैं जो पृथ्वी में समा जाती हैं, और कहीं वे स्वयं आदिशक्ति के रूप में असुरों का संहार करती हैं। यह आलेख वाल्मीकि रामायण, तमिल कवि कंबन के रामावतारम्, संस्कृत महाकवि कालिदास के रघुवंश और अद्भुत रामायण — इन चार भिन्न परंपराओं में सीता के त्याग, तप, ताप और राष्ट्रधर्म को अलग-अलग रखकर, बिना उन्हें आपस में घुलाए-मिलाए, तुलनात्मक दृष्टि से समझने का प्रयास करता है। सीता का त्याग पलायन नहीं, चुनाव है : और यही चुनाव उन्हें भारतीय राष्ट्र-चेतना की सबसे उदात्त प्रतीक-मूर्ति बनाता है।



त्याग, तप, ताप और राष्ट्रधर्म — ये चार शब्द केवल वर्णनात्मक विशेषण नहीं, अपितु सीता के संपूर्ण जीवन-चरित्र को समझने की चार कुंजियाँ हैं। त्याग वह क्षण है जब सीता किसी सुविधा या सुरक्षा को अपनी इच्छा से छोड़ देती हैं। तप वह प्रक्रिया है जिसमें वे उस त्याग के परिणामों को धैर्यपूर्वक जीती हैं। ताप वह आंतरिक वेदना है जो अन्याय और अलगाव से उपजती है, किंतु जिसे वे कभी विद्रोह अथवा प्रतिशोध में नहीं बदलतीं। और राष्ट्रधर्म वह व्यापक दृष्टि है जिसके कारण वे अपने प्रत्येक निजी दुख को भी बड़े सामाजिक-राजनैतिक संदर्भ में रखकर देखती हैं। आगे के खंडों में हम इन चारों तत्वों को चार भिन्न रामकथा-परंपराओं के दर्पण में परखेंगे।प्रथम खंड — वाल्मीकि रामायण,आदिकाव्य में सीता का त्याग और तप,आदिकवि वाल्मीकि की सीता सबसे पहले हमारे सम्मुख अरण्यकांड में प्रकट होती हैं, जब लक्ष्मण उन्हें राम की खोज में जाने की अनुमति माँगते हैं और सीता संदेह में लक्ष्मण पर कठोर वचन कह बैठती हैं। किंतु उसी सीता का सच्चा तेज सुंदरकांड में प्रकट होता है, जब अशोक वाटिका में बंदिनी होकर भी वे रावण के सामने विचलित नहीं होतीं। वाल्मीकि यहाँ सीता के त्याग को शारीरिक भय से नहीं, नैतिक दृढ़ता से गढ़ते हैं : सीता स्वयं कहती हैं कि लक्ष्मण के अतिरिक्त वे किसी अन्य पुरुष का स्पर्श तक स्वीकार नहीं करेंगी, चाहे प्राण ही क्यों न त्यागने पड़ें।

गोदावरी प्रवेक्ष्यामि हीना रामेण लक्ष्मण।

आबन्धिष्येऽथवा त्यक्ष्ये विषमे देहमात्मनः॥

पिबामि वा विषं तीक्ष्णं प्रवेक्ष्यामि हुताशनम्।

न त्वहं राघवादन्यं कदापि पुरुषं स्पृशे॥

हे लक्ष्मण! राम के बिना मैं गोदावरी में प्रवेश कर जाऊँगी, अथवा फाँसी लगा लूँगी, या तीक्ष्ण विष पी लूँगी, या अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगी — किंतु मैं राघव के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष का स्पर्श कभी नहीं करूँगी।: वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड, सर्ग ४५,यही तेज सुंदरकांड में रावण के समक्ष उग्रतर होकर प्रकट होता है, जहाँ सीता स्वयं को लंका की समूची राक्षस-शक्ति से बड़ी सिद्ध करती हैं : शरीर से बंदिनी होकर भी मन और आत्मा से वे कभी बंदिनी नहीं बनतीं। अशोक वाटिका में महीनों तक अकेली, भयभीत राक्षसियों से घिरी, उपवास और शोक से क्षीण होती हुई भी सीता अपने धैर्य का त्याग नहीं करतीं , वाल्मीकि इसी अवस्था को उनके तप का प्रथम चरण मानते हैं, जहाँ शरीर क्षीण होता है किंतु संकल्प अडिग रहता है।

अग्निपरीक्षा और उत्तरकांड का ताप::वाल्मीकि की सीता का ताप तब चरम पर पहुँचता है जब लंका-विजय के पश्चात राम, सबके समक्ष, उनसे अग्निपरीक्षा की अपेक्षा करते हैं। सीता बिना किसी प्रतिरोध के अग्नि में प्रवेश करती हैं, और अग्निदेव स्वयं उन्हें शुद्ध सिद्ध करते हैं। यह प्रसंग सीता के तप की उस पराकाष्ठा को दर्शाता है जहाँ वे अपने सतीत्व को समाज के समक्ष सिद्ध करने के दायित्व को भी स्वीकार करती हैं, केवल इसलिए कि राम और राष्ट्र की मर्यादा पर कोई आँच न आए। किंतु यही ताप उत्तरकांड में पुनः लौटता है, अधिक निर्मम रूप में , जब एक धोबी के आक्षेप मात्र से, गर्भवती सीता को पुनः वन में भेज दिया जाता है। वाल्मीकि यहाँ इस अन्याय को छिपाते नहीं, बल्कि सीधे शब्दों में अंकित करते हैं, यह दिखाते हुए कि आदिकवि की दृष्टि में भी यह निर्णय अत्यंत कठोर था। किंतु वाल्मीकि की सीता इस अन्याय के विरुद्ध न शाप देती हैं, न विलाप में डूबकर आत्मसम्मान खोती हैं — वे वाल्मीकि के ही आश्रम में तपस्विनी का जीवन चुनती हैं, लव-कुश का पालन करती हैं, और अंततः जब पुनः शुद्धता सिद्ध करने को कहा जाता है, तो धरती माँ की गोद में समा जाना चुनती हैं। यह अंतिम त्याग वाल्मीकि की सीता को व्यक्ति से प्रतीक में रूपांतरित कर देता है — वे सिद्ध करती हैं कि सत्य को बार-बार सिद्ध करने की मांग स्वयं में अन्याय है, और आत्मसम्मान राजसत्ता से भी बड़ा मूल्य है। यहीं वाल्मीकि की सीता का राष्ट्रधर्म भी प्रकट होता है , धरती में समाकर भी वे राम अथवा अयोध्या के विरुद्ध कोई शाप नहीं देतीं; वे केवल स्वयं को उस मर्यादा से मुक्त कर लेती हैं जो अब उन पर असहनीय भार बन चुकी थी।



कंब रामायणम्,तमिल भक्ति-परंपरा में सीता::बारहवीं शताब्दी के तमिल महाकवि कंबन ने अपने रामावतारम् में सीता को वाल्मीकि से भिन्न, किंतु उतनी ही गहन भावभूमि पर प्रतिष्ठित किया है। कंबन की सीता अधिक मुखर, अधिक भावप्रवण और अपने निर्णयों में अधिक प्रत्यक्ष कर्ता हैं। जहाँ वाल्मीकि की सीता का तप मौन-सा है, वहाँ कंबन की सीता अपने त्याग और वेदना को शब्दों में प्रकट करने में संकोच नहीं करतीं ,यह तमिल भक्ति-परंपरा की उस विशेषता से मेल खाता है जहाँ भक्त और आराध्य के बीच का संवाद अत्यंत आत्मीय और भावाकुल होता है। कंबन के काव्य में स्वयंवर-प्रसंग में सीता की आंतरिक उत्कंठा, वन-गमन के समय उनका राम के साथ चलने का हठ, और अशोक वाटिका में उनकी वेदना , इन सभी प्रसंगों में कंबन भावनाओं के सूक्ष्मतम स्तर तक उतरते हैं। तमिल काव्य-परंपरा में सीता को केवल सहनशील नारी के रूप में नहीं, बल्कि प्रेम और धर्म दोनों में समान रूप से दृढ़ निश्चयी नायिका के रूप में चित्रित किया गया है। कंबन की सीता का राष्ट्रधर्म इस अर्थ में विशिष्ट है कि वे स्वयं को अयोध्या और मिथिला , दोनों की मर्यादा की संवाहिका मानती हैं, और अपने प्रत्येक निर्णय में इस दुहरे दायित्व को जीती हैं।कंबन की सीता मौन सहनशीलता की नहीं, मुखर समर्पण की प्रतिमा हैं , जहाँ प्रेम स्वयं तप का रूप धारण कर लेता है। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि कंबन की सीता वाल्मीकि की सीता से पृथक् एक स्वतंत्र काव्य-सृष्टि हैं, न कि उसका अनुवाद अथवा विस्तार , तमिल शैव-वैष्णव भक्ति-चेतना की अपनी मौलिक दृष्टि इसमें समाहित है, और इसे वाल्मीकि की मूल कथा से पृथक् रखकर ही समझा जाना चाहिए। कंबन के काव्य की एक और विशेषता यह है कि वे सीता के त्याग को दक्षिण भारतीय समाज की पारिवारिक और सामुदायिक भावभूमि में प्रतिष्ठित करते हैं। वन-गमन के समय सीता का यह आग्रह कि वे राम के बिना अयोध्या के वैभव में नहीं रह सकतीं, कंबन के यहाँ केवल दांपत्य-प्रेम की घोषणा नहीं, बल्कि यह उद्घोष भी है कि सच्चा राजधर्म वहीं है जहाँ पति-पत्नी एक साथ प्रजा और धर्म दोनों का वहन करते हैं। इस प्रकार कंबन की सीता तमिल भूमि की सामाजिक चेतना में रामकथा को नए सिरे से जीवंत बनाती हैं, और सिद्ध करती हैं कि सीता का चरित्र किसी एक भाषा-क्षेत्र तक सीमित नहीं, अपितु सम्पूर्ण भारतवर्ष की साझा सांस्कृतिक विरासत है।



कालिदास-कृत रघुवंश,राजधर्म और सीता का परित्याग::महाकवि कालिदास ने रघुवंश महाकाव्य के चौदहवें सर्ग में राम के राज्याभिषेक के पश्चात के उस मार्मिक प्रसंग को चित्रित किया है, जहाँ लोकापवाद के भय से राम गर्भवती सीता का त्याग करने का निर्णय लेते हैं। कालिदास इस प्रसंग को अत्यंत संयत किंतु गहन वेदना के साथ प्रस्तुत करते हैं — राम स्वयं अपने भाइयों से कहते हैं कि सीता पूर्णतः निर्दोष हैं, फिर भी लोकापवाद की छाया, चंद्रमा पर पड़ने वाले पृथ्वी के कलंक-चिह्न के समान, राजधर्म की मर्यादा के लिए असह्य है। कालिदास की सीता यहाँ त्याग की दोहरी परतें जीती हैं , पहले वे अपने पति द्वारा त्यागी जाती हैं, और फिर भी अपने पति के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं कहतीं। लक्ष्मण जब गंगा के तट पर उन्हें राम की आज्ञा सुनाते हैं, तो सीता मूर्च्छित होकर गिर पड़ती हैं, किंतु चेतना लौटने पर वे अपने ही भाग्य को कोसती हैं, राम को नहीं। वे लक्ष्मण से कहलवाती हैं कि राम ने पत्नी के रूप में नहीं तो कम-से-कम प्रजा के रूप में उन्हें अपनी कृपा-दृष्टि से वंचित न करें , यह वाक्य सीता के राष्ट्रधर्म की पराकाष्ठा है: व्यक्तिगत संबंध टूटने पर भी वे स्वयं को राज्य और प्रजा से पृथक् नहीं मानतीं।

कालिदास स्पष्ट करते हैं कि राम का यह निर्णय हृदय से नहीं, राजधर्म के दबाव से उपजा था, और स्वयं राम भी भीतर-ही-भीतर शोकाकुल रहते हैं, यज्ञों में पत्नी-स्थान पर सीता की स्वर्ण-प्रतिमा रखकर अनुष्ठान करते हैं। यह पूरा प्रसंग राजधर्म और दांपत्य-न्याय के बीच के उस शाश्वत द्वंद्व को उजागर करता है, जिसमें सीता का तप — वाल्मीकि के आश्रम में तपस्विनी-वेश में रहकर पुत्रों का पालन करना — राष्ट्र की मर्यादा-रक्षा के लिए दिया गया सबसे बड़ा वैयक्तिक बलिदान बनकर उभरता है।


(यह प्रसंग रघुवंश के चौदहवें सर्ग, 'सीता का परित्याग', में विस्तार से वर्णित है — मूल संस्कृत पाठ के भावानुवाद पर आधारित प्रस्तुति यहाँ संक्षेप में दी गई है।)


अद्भुत रामायण,सीता : साक्षात् आदिशक्ति का प्राकट्य:: जहाँ वाल्मीकि, कंबन और कालिदास की सीता सहनशीलता और तप की प्रतिमा हैं, वहाँ अद्भुत रामायण की सीता एक सर्वथा भिन्न, प्रचंड शक्ति-रूप में प्रकट होती हैं। सत्ताईस सर्गों के इस अपेक्षाकृत परवर्ती किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ में सीता को स्पष्टतः आदिशक्ति के अवतार के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। इस ग्रंथ की सबसे प्रसिद्ध कथा के अनुसार, रावण-वध और राज्याभिषेक के पश्चात जब मुनिगण राम के पराक्रम की स्तुति करने लगते हैं, तो सीता मुस्कुरा उठती हैं। कारण पूछने पर वे बताती हैं कि राम ने तो केवल दशानन रावण का वध किया है, किंतु उसके सहस्रमुख भाई सहस्रानन अभी जीवित है, और उसे पराजित किए बिना यह शौर्यगाथा अधूरी है। युद्ध में जब सहस्रानन के एक ही बाण से राम की समूची सेना तितर-बितर हो जाती है और स्वयं राम मूर्छित हो जाते हैं, तब सीता काली का उग्र रूप धारण कर सहस्रमुख रावण का संहार करती हैं। उनका यह रौद्र रूप इतना प्रचंड हो जाता है कि स्वयं देवताओं को भगवान शिव से प्रार्थना करनी पड़ती है, और शिव के चरणस्पर्श से ही सीता का यह काली-रूप पुनः सौम्य रूप में परिवर्तित होता है।अद्भुत रामायण की सीता तप और त्याग की सीमा लांघकर स्वयं संहारशक्ति बन जाती हैं , यह कथा सिद्ध करती है कि सीता की सहनशीलता उनकी असमर्थता नहीं, उनका सायास संयम थी।


इस प्रसंग के पश्चात राम स्वयं सीता की जानकी-सहस्रनाम से स्तुति करते हैं — यह स्तोत्र सीता को साक्षात् आदिशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करता है। अद्भुत रामायण की यह कथा वाल्मीकि, कंबन अथवा कालिदास की कथाओं से भिन्न परंपरा की है, और इसे उनसे मिलाकर नहीं, अपितु एक स्वतंत्र शाक्त-दृष्टि से रामकथा के पुनर्पाठ के रूप में ही समझा जाना चाहिए। इसका महत्व इस बात में है कि यह भारतीय परंपरा में सीता की छवि को केवल सहनशीलता तक सीमित न रखकर, उन्हें स्वयं राष्ट्र-रक्षा की अंतिम शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करता है।



तुलनात्मक चिंतन,चार परंपराएँ, एक चरित्र-सत्य:इन चार परंपराओं को साथ रखकर देखने पर सीता के चरित्र की एक बहुआयामी छवि उभरती है, जिसे किसी एक ग्रंथ में समेटना संभव नहीं। वाल्मीकि की सीता नैतिक दृढ़ता और मौन तप की प्रतिमा हैं। कंबन की सीता भावप्रवण, मुखर और प्रेम में भी अडिग निश्चय की प्रतिमूर्ति हैं। कालिदास की सीता राजधर्म के समक्ष वैयक्तिक न्याय का बलिदान करने वाली, फिर भी राष्ट्र के प्रति निष्ठा न त्यागने वाली तपस्विनी हैं। और अद्भुत रामायण की सीता स्वयं वह आदिशक्ति हैं जिनकी सहनशीलता, संयम की उपज है, असमर्थता की नहीं।

त्याग::चारों परंपराओं में त्याग का स्वरूप भिन्न है — वाल्मीकि में यह सतीत्व-रक्षा का त्याग है, कंबन में यह प्रेम की मुखर स्वीकृति में निहित त्याग है, रघुवंश में यह राजधर्म के समक्ष दांपत्य-सुख का त्याग है, और अद्भुत रामायण में यह अपनी शक्ति को सामान्यतः प्रकट न करने का, संयम का त्याग है।

तप और ताप::वाल्मीकि और कालिदास दोनों में सीता का तप वन-वास और आश्रम-जीवन के रूप में प्रकट होता है, जबकि उनका ताप — मानसिक वेदना — लोकापवाद और अलगाव से उपजता है। कंबन में यह ताप अधिक भावाकुल भाषा में व्यक्त होता है, तो अद्भुत रामायण में सीता का संचित तप अंततः शक्ति के विस्फोट के रूप में प्रकट होकर स्वयं ताप का कारण बनने वाली शक्तियों का ही संहार कर देता है।


राष्ट्रधर्म;चारों परंपराओं में सामान्य सूत्र यह है कि सीता अपने वैयक्तिक सुख-दुख को सदैव व्यापक धर्म-मर्यादा और राष्ट्र-हित के अधीन रखती हैं। वे कभी राम की निंदा नहीं करतीं, कभी अयोध्या के विरुद्ध शाप नहीं देतीं, बल्कि हर परिस्थिति में स्वयं को राष्ट्र की मर्यादा-रक्षा की एक अनिवार्य कड़ी मानती हैं। यही तत्व सीता को केवल एक पौराणिक पात्र से ऊपर उठाकर भारतीय राष्ट्र-चेतना का शाश्वत प्रतीक बना देता है।


आयाम

वाल्मीकि रामायण,कंब रामायणम्

रघुवंश (कालिदास)

अद्भुत रामायण,त्याग का स्वरूप

सतीत्व-रक्षा हेतु आत्म-त्याग,प्रेम की मुखर, सहज स्वीकृति

राजधर्म हेतु दांपत्य-सुख का त्याग,संयम हेतु शक्ति-प्रदर्शन का त्याग

तप का केंद्र,अशोक वाटिका, वाल्मीकि-आश्रम

वन-गमन का अटल हठ,आश्रम-जीवन, पुत्र-पालन

संचित शक्ति का धैर्यपूर्ण दमन,ताप का कारण

बंदी-जीवन, अग्निपरीक्षा, वन-त्याग,विरह और भावनात्मक वेदना

लोकापवाद, अकारण परित्याग,अन्याय के प्रति सुप्त क्षोभ

राष्ट्रधर्म की अभिव्यक्ति,मौन मर्यादा-पालन

मिथिला-अयोध्या दोनों की गरिमा,प्रजा के प्रति निष्ठा न त्यागना

राष्ट्र-रक्षा हेतु प्रत्यक्ष शक्ति-प्रयोग




समकालीन प्रासंगिकता,आज के भारत में सीता का संदेश:: आज जब भारतीय समाज स्त्री-गरिमा, न्याय और सामाजिक मर्यादा के प्रश्नों से पुनः जूझ रहा है, सीता का चरित्र केवल धार्मिक स्मरण नहीं, एक जीवंत मार्गदर्शक-सूत्र बन जाता है। सीता का त्याग हमें सिखाता है कि आत्म सम्मान की रक्षा और सामाजिक मर्यादा का पालन परस्पर विरोधी नहीं, अपितु परस्पर पूरक हो सकते हैं। सीता का तप हमें सिखाता है कि विपत्ति में भी गरिमा नहीं खोई जानी चाहिए। और सीता का ताप हमें स्मरण कराता है कि अन्याय को सहना, उसे स्वीकार कर लेना नहीं है —,अद्भुत रामायण की सीता इस बात का प्रमाण हैं कि संचित सहनशीलता अंततः असीम शक्ति में रूपांतरित हो सकती है।

सीता का राष्ट्रधर्म हमें यह भी सिखाता है कि व्यक्ति और राष्ट्र के बीच का संबंध केवल अधिकारों का नहीं, दायित्वों का भी है ,और यह दायित्व-बोध, विशेषकर संकट के क्षणों में, ही किसी सभ्यता की सच्ची परीक्षा होता है। सीता के चारों रूप , वाल्मीकि की तपस्विनी, कंबन की प्रेममयी, कालिदास की राजधर्म-निष्ठ, और अद्भुत रामायण की आदिशक्ति — मिलकर एक ऐसी सम्पूर्ण नारी-चेतना गढ़ते हैं, जो आज के भारत के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी सहस्राब्दियों पूर्व थी। विशेषरूप से आज की युवा पीढ़ी के लिए सीता का चरित्र इस भ्रांति को तोड़ता है कि सहनशीलता और सशक्तता परस्पर विरोधी गुण हैं। सीता एक साथ दोनों हैं , वे प्रतीक्षा भी करती हैं और आवश्यकता पड़ने पर प्रचंड शक्ति भी बन जाती हैं। यह द्वैत ही भारतीय नारी-चेतना की वह विशिष्टता है जिसे पश्चिमी सांचों में समझना कठिन है, किंतु जिसे भारतीय परंपरा ने सहस्राब्दियों से जिया और गाया है। 'कौटिल्य का भारत दैनिक' का यह प्रयास इसी चेतना को नई पीढ़ी तक सुगम भाषा में पहुँचाने का एक विनम्र प्रयास है।



सीता का त्याग, तप, ताप और राष्ट्रधर्म — ये चार शब्द वस्तुतः एक ही सत्य के चार आयाम हैं। वे किसी एक ग्रंथ अथवा किसी एक कवि-दृष्टि में समाहित नहीं हो सकते, क्योंकि सीता स्वयं भारतीय सभ्यता की उस समग्रता का प्रतिनिधित्व करती हैं जो एक साथ सहनशील भी है और शक्तिशाली भी, विनम्र भी है और अडिग भी।

वाल्मीकि हमें सिखाते हैं कि मौन मर्यादा भी एक प्रकार का पराक्रम है। कंबन हमें सिखाते हैं कि प्रेम की मुखर स्वीकृति दुर्बलता नहीं, साहस है। कालिदास हमें सिखाते हैं कि राजधर्म की कठोरतम माँगों के समक्ष भी गरिमा बनाए रखी जा सकती है। और अद्भुत रामायण हमें सिखाता है कि जो शक्ति संयम में बँधी दिखती है, वह असीम भी हो सकती है। इन चारों शिक्षाओं का समवेत स्वर ही सीता के व्यक्तित्व की वह संपूर्णता रचता है जिसे भारतीय समाज ने सहस्राब्दियों तक अपने हृदय में सँजोकर रखा है!

  संपादक: राजेन्द्र नाथ तिवारी


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