लोकतंत्र के तीनों स्तंभ पहले अपना चाल, चरित्र और चेहरा ठीक करें, फिर प्रेस को नसीहत दें!"

 

लोकतंत्र के तीन स्तंभ पहले अपना चेहरा देखें, फिर प्रेस को आईना दिखाएँ

कौटिल्य दृष्टि /संपादकीय 

सच्चाई, ईमानदारी, चरित्र और आत्मविश्वास,ये चार शब्द भारत में सबसे अधिक बोले जाते हैं, सबसे अधिक पढ़ाए जाते हैं और सबसे कम जीए जाते हैं। उपदेश देना सरल है, किंतु उन्हें अपने आचरण में उतारना अत्यंत कठिन। यही आज के भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी है।

लोकतंत्र को स्वीकार करते समय विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को उसकी प्राणवायु माना गया। बाद में प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया, क्योंकि उसका दायित्व सत्ता की निगरानी करना था, सत्ता का अंग बनना नहीं। आज विडंबना यह है कि लोकतंत्र के तीनों संवैधानिक स्तंभ अपनी-अपनी कमजोरियों पर आत्ममंथन करने के बजाय बार-बार प्रेस को ही नसीहत देने में व्यस्त दिखाई देते हैं। कभी पत्रकारिता की मर्यादा का पाठ पढ़ाया जाता है, कभी फर्जी पत्रकारों का प्रश्न उठाया जाता है, तो कभी प्रेस की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाए जाते हैं। प्रश्न यह है कि क्या इन तीनों स्तंभों ने स्वयं अपने चरित्र का भी उतनी ही कठोरता से परीक्षण किया है?

विधायिका में दलबदल, धनबल, बाहुबल, चुनावी भ्रष्टाचार और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले जनप्रतिनिधियों की बढ़ती संख्या क्या लोकतंत्र की गरिमा बढ़ाती है? कार्यपालिका में रिश्वत, दलाली, फाइलों का खेल और सत्ता के दबाव में झुकती प्रशासनिक व्यवस्था क्या आदर्श शासन का उदाहरण है? न्यायपालिका पर लंबित करोड़ों मुकदमे, न्याय में विलंब, पारदर्शिता को लेकर उठते प्रश्न,क्या इन पर गंभीर आत्मचिंतन नहीं होना चाहिए? यदि चरित्र की कसौटी पर परखा जाए तो किसी एक स्तंभ को पूर्णतः निर्दोष नहीं कहा जा सकता। इसलिए केवल प्रेस को कठघरे में खड़ा करना न्याय संगत नहीं है।

हाँ, पत्रकारिता भी आज संकट से गुजर रही है। कुछ लोगों ने पत्रकारिता को मिशन नहीं, कमीशन बना दिया है। कहीं ब्लैकमेलिंग है, कहीं विज्ञापन की दलाली, कहीं सत्ता की चाटुकारिता और कहीं धन के लिए खबरों का सौदा। ऐसे तत्वों ने पत्रकारिता की प्रतिष्ठा को आघात पहुँचाया है। लेकिन क्या कुछ अपवादों के आधार पर पूरे प्रेस जगत को दोषी ठहरा देना उचित होगा? यदि यही तर्क अपनाया जाए तो फिर क्या भ्रष्ट नेताओं, अधिकारियों या न्यायिक विवादों के कारण पूरी विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को भी दोषी मान लिया जाए?

हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि हर मोबाइल धारक पत्रकार नहीं हो सकता। यह बात अपनी जगह उचित हो सकती है। पत्रकारिता के नाम पर फर्जीवाड़ा रोकना आवश्यक है। लेकिन समान रूप से यह भी उतना ही आवश्यक है कि हर चुनाव जीतने वाला आदर्श जनप्रतिनिधि नहीं होता, हर अधिकारी ईमानदार नहीं होता और हर न्यायिक व्यवस्था त्रुटिहीन नहीं होती। सुधार का दायित्व सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए।लोकतंत्र में प्रेस कोई शत्रु नहीं, बल्कि चेतावनी की घंटी है। यदि घंटी बजनी बंद हो जाए तो आग पूरे भवन को निगल सकती है। इसलिए प्रेस को नियंत्रित करने से अधिक आवश्यक है कि लोकतंत्र के सभी स्तंभ अपने भीतर झाँकें।

कौटिल्य ने स्पष्ट कहा था कि राज्य का सबसे बड़ा शत्रु बाहरी आक्रमणकारी नहीं, बल्कि भीतर बैठा हुआ भ्रष्टाचार और चरित्रहीनता है। जिस राष्ट्र के नीति-निर्माता स्वयं नैतिक बल खो देते हैं, वहाँ कानून का भय भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।

आज आवश्यकता किसी एक स्तंभ को उपदेश देने की नहीं, बल्कि चारों स्तंभों के संयुक्त आत्मशुद्धि अभियान की है। लोकतंत्र केवल कानूनों से नहीं चलता, बल्कि चरित्र से चलता है। संविधान केवल अधिकार नहीं देता, वह उत्तरदायित्व भी सौंपता है।

यदि विधायिका ईमानदार होगी, कार्यपालिका निष्पक्ष होगी, न्यायपालिका समयबद्ध और पारदर्शी होगी तथा प्रेस निर्भीक और निष्पक्ष होगा, तभी लोकतंत्र सशक्त होगा।अन्यथा, उपदेशों का यह बाज़ार चलता रहेगा, भाषण गूँजते रहेंगे, नसीहतें बंटती रहेंगी और जनता पूछती रहेगी,"पहले अपना चल-चरित्र-चेहरा तो ठीक कीजिए, फिर हमें आदर्शों का पाठ पढ़ाइए।"

लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट प्रेस नहीं, चरित्र का पतन है। जिस दिन चारों स्तंभ आत्मनिरीक्षण का साहस जुटा लेंगे, उसी दिन भारत का लोकतंत्र वास्तव में विश्व के लिए आदर्श बन सकेगा।

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