इतिहास का न्याय सोशल मीडिया नहीं करेगा
राजेन्द्र नाथ तिवारी 272001सवाल केवल सावरकर का नहीं है। सवाल यह है कि क्या हम इतिहास को दस्तावेज़ों, संदर्भों और प्रमाणों से पढ़ेंगे या फिर सोशल मीडिया के नारों से? यदि एक पक्ष केवल सावरकर के पत्र पढ़ेगा और दूसरा केवल गांधी के पत्र, तो दोनों इतिहास के साथ अन्याय करेंगे।राजनीतिक विमर्श की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि जिन लोगों ने स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग पर राजनीति की, वही आज उन्हें चुनावी पोस्टर और टीवी बहस का विषय बना रहे हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों का मूल्यांकन राजनीतिक सुविधा से नहीं, ऐतिहासिक ईमानदारी से होना चाहिए।
इतिहास प्रतिशोध का नहीं, सत्य का विषय है। यदि किसी पर आरोप लगाना है, तो प्रमाण के साथ लगाइए। यदि किसी का सम्मान करना है, तो उसके सम्पूर्ण जीवन को देखकर कीजिए। राष्ट्र उन समाजों से बनता है जो इतिहास से सीखते हैं; उन समाजों से नहीं जो इतिहास को हथियार बनाते हैं।

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