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शुक्रवार, 26 जून 2026

"सावरकर पर प्रहार, गांधी पर मौन: क्या इतिहास के लिए दो अलग-अलग तराजू?"

 इतिहास का न्याय सोशल मीडिया नहीं करेगा

राजेन्द्र  नाथ  तिवारी 272001

वीर सावरकर पर चर्चा होते ही कुछ राजनीतिक दलों और उनके समर्थकों की जुबान पर एक ही शब्द चढ़ जाता है"माफीवीर"। मानो किसी व्यक्ति के जीवन का सम्पूर्ण मूल्यांकन एक-दो पत्रों में समा जाता हो। प्रश्न यह है कि यदि इतिहास का फैसला केवल पत्रों से होना है, तो क्या वही कसौटी सब पर लागू होगी?महात्मा गांधी ने भी ब्रिटिश शासन के अधिकारियों और वायसराय को अनेक पत्र लिखे। उन पत्रों की भाषा तत्कालीन प्रशासनिक शिष्टाचार के अनुरूप थी। क्या केवल उन औपचारिक शब्दों के आधार पर गांधी के पूरे स्वतंत्रता संग्राम को नकार दिया जा सकता है? बिल्कुल नहीं। उसी प्रकार केवल दया-याचिकाओं के आधार पर सावरकर के समूचे जीवन को "माफीवीर" कह देना भी बौद्धिक बेईमानी है।भारत का दुर्भाग्य यह है कि यहाँ इतिहास का अध्ययन कम और राजनीतिक व्यापार अधिक होता है। कांग्रेस हो या कोई अन्य दल—जब इतिहास को वोटों का हथियार बनाया जाता है, तब राष्ट्र का बौद्धिक पतन शुरू होता है।

सवाल केवल सावरकर का नहीं है। सवाल यह है कि क्या हम इतिहास को दस्तावेज़ों, संदर्भों और प्रमाणों से पढ़ेंगे या फिर सोशल मीडिया के नारों से? यदि एक पक्ष केवल सावरकर के पत्र पढ़ेगा और दूसरा केवल गांधी के पत्र, तो दोनों इतिहास के साथ अन्याय करेंगे।राजनीतिक विमर्श की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि जिन लोगों ने स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग पर राजनीति की, वही आज उन्हें चुनावी पोस्टर और टीवी बहस का विषय बना रहे हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों का मूल्यांकन राजनीतिक सुविधा से नहीं, ऐतिहासिक ईमानदारी से होना चाहिए।

इतिहास प्रतिशोध का नहीं, सत्य का विषय है। यदि किसी पर आरोप लगाना है, तो प्रमाण के साथ लगाइए। यदि किसी का सम्मान करना है, तो उसके सम्पूर्ण जीवन को देखकर कीजिए। राष्ट्र उन समाजों से बनता है जो इतिहास से सीखते हैं; उन समाजों से नहीं जो इतिहास को हथियार बनाते हैं।

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