कटा हुआ हाथ नहीं, व्यवस्था पर कटा हुआ विश्वास!
“समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।”
रामधारी सिंह दिनकर
कानपुर की घटना ने भारत को केवल एक विचलित कर देने वाला दृश्य नहीं दिखाया; उसने उस मौन पीड़ा को उजागर किया है, जो धीरे-धीरे भारतीय समाज के भीतर जमा होती जा रही है।
एक पुत्र अपनी माँ का कटा हुआ हाथ लेकर न्याय की गुहार लगाता है, अर्धसैनिक बल के जवान पुलिस आयुक्तालय पहुँचते हैं, प्रशासन सफाई देता है, अस्पताल आरोपों से इंकार करता है, और पूरा देश उस दृश्य को स्क्रीन पर देखकर स्तब्ध रह जाता है।
लेकिन इस घटना का सबसे भयावह पक्ष वह हाथ नहीं है जो कटा; सबसे भयावह पक्ष वह विश्वास है जो समाज के भीतर कटता हुआ दिखाई दे रहा है।
लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता।
वह इस भरोसे पर टिका होता है कि—
अस्पताल जीवन बचाएँगे,पुलिस निष्पक्ष होगी,
और न्याय व्यवस्था सत्य तक पहुँचेगी।
जब यह भरोसा कमजोर पड़ता है, तब समाज धीरे-धीरे संवैधानिक ढाँचे के भीतर रहते हुए भी मानसिक रूप से असुरक्षित होने लगता है।
भारत आज उसी संक्रमणकाल से गुजर रहा है।
यह घटना स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी कठोर प्रश्नचिह्न लगाती है। भारतीय परंपरा में वैद्य को देवतुल्य माना गया था। चरक और सुश्रुत की भूमि पर चिकित्सा केवल पेशा नहीं, लोकधर्म थी।किन्तु आज चिकित्सा का बड़ा हिस्सा बाजार, पैकेज और कॉर्पोरेट संरचनाओं के बीच घिरता जा रहा है।रोगी अब “मानव” कम और “केस” अधिक दिखाई देने लगा है।
यदि किसी परिवार को यह महसूस हो कि चिकित्सा-त्रुटि के बाद भी सत्य दबाया जा सकता है, तो उसका आक्रोश केवल अस्पताल के विरुद्ध नहीं रहता; वह पूरी व्यवस्था के विरुद्ध खड़ा हो जाता है।और यहीं लोकतंत्र का वास्तविक संकट प्रारंभ होता है।इस घटना का दूसरा गंभीर पक्ष है संस्थागत अविश्वास।
जब राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़ा अनुशासित बल स्वयं सार्वजनिक विरोध का मार्ग चुनता है, तब यह केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं रहती; यह राज्य और नागरिक के बीच बढ़ती दूरी का संकेत बन जाती है।प्रश्न यह नहीं कि जवान क्यों पहुँचे।
प्रश्न यह है कि उन्हें क्यों लगा कि सामान्य प्रक्रिया पर्याप्त नहीं है।भारत में न्याय की सबसे बड़ी समस्या केवल विलंब नहीं, बल्कि विश्वास का संकट है।जनता को निर्णय से पहले प्रक्रिया पर भरोसा चाहिए। यदि जांच निष्पक्ष दिखाई न दे, तो सत्य भी संदिग्ध लगने लगता है।सोशल मीडिया ने इस संकट को और तीव्र बना दिया है।
आज न्यायालय से पहले कैमरा सक्रिय होता है, और तथ्य से पहले दृश्य जनमत बना देता है।
थर्माकोल बॉक्स में रखा कटा हुआ हाथ आधुनिक भारत की दृश्य-राजनीति का ऐसा प्रतीक बन गया, जिसने पूरे तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया।
किन्तु इस घटना का एक दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।किसी भी लोकतंत्र में संस्थाओं पर सामूहिक दबाव की राजनीति अंततः खतरनाक हो सकती है।यदि हर समूह अपनी संख्या, शक्ति या संगठन के आधार पर न्याय लेने लगे, तो संवैधानिक संतुलन कमजोर होगा।भीड़ का दबाव कभी स्थायी न्याय नहीं दे सकता।
इसलिए यह घटना दोहरी चेतावनी है,संस्थाएँ पारदर्शी बनें,और समाज धैर्य एवं संवैधानिक मर्यादा बनाए रखे।भारत को यह समझना होगा कि विकसित राष्ट्र केवल ऊँची इमारतों और एक्सप्रेसवे से नहीं बनते।वे उस विश्वास से बनते हैं, जहाँ एक सामान्य नागरिक को यह भरोसा हो कि उसकी पीड़ा सुनी जाएगी, सत्य दबाया नहीं जाएगा और न्याय प्रभाव का मोहताज नहीं होगा।
क्योंकि किसी भी राष्ट्र का सबसे बड़ा संकट आर्थिक नहीं होता;सबसे बड़ा संकट वह होता है, जब जनता व्यवस्था को देखकर यह कहने लगे
“अब हमें भरोसा नहीं रहा।”

श्री तिवारी जी आपका लेख सदैव उत्कृष्ट कोटि का होता है। आपको साधुवाद
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