माफीवीर और सत्यवीर : राष्ट्र, न्याय और आत्मसम्मान का प्रश्न
मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी मृत्यु नहीं है।सबसे बड़ी त्रासदी है — जीवित रहते हुए भीतर से मर जाना।इतिहास गवाह है कि संसार ने उन लोगों को कभी याद नहीं रखा जिन्होंने हर मोड़ पर समझौते किए। भीड़ में जीने वाले लोग भीड़ में खो जाते हैं। किंतु जो व्यक्ति सत्य के पक्ष में खड़ा हो जाता है, वह अपने समय से बड़ा हो जाता है। उसका शरीर भले मिट जाए, पर उसका प्रतिरोध अमर हो जाता है।
सुकरात आज भी इसलिए जीवित हैं क्योंकि उन्होंने विषपान कर लिया, लेकिन अपने विचारों से क्षमा नहीं मांगी। उन्होंने सत्ता से यह नहीं कहा कि “मुझसे भूल हो गई।” उन्होंने कहा — “यदि सत्य अपराध है, तो दंड दीजिए।”सभ्यताओं का इतिहास बताता है कि सत्ता हमेशा प्रश्नों से डरती है। राजा को तलवार से उतना भय नहीं होता जितना एक निर्भीक कलम से होता है। क्योंकि तलवार शरीर को घायल करती है, लेकिन प्रश्न व्यवस्था की आत्मा को घायल कर देता है।
आज का सबसे बड़ा संकट यही है कि राष्ट्र में सत्य बोलने वाले कम होते जा रहे हैं और माफी मांगने वाले बढ़ते जा रहे हैं।समझौता अब विवेक नहीं, जीवनशैली बन चुका है।जब कोई शिक्षक, लेखक, पत्रकार या बुद्धिजीवी सत्ता के सामने घुटने टेक देता है, तब केवल एक व्यक्ति पराजित नहीं होता — समाज की बौद्धिक रीढ़ टूटती है। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम नहीं लिखता; वह आने वाली पीढ़ियों की चेतना गढ़ता है। यदि वही भयभीत हो जाए, तो राष्ट्र के भीतर स्वतंत्र विचार की मृत्यु आरंभ हो जाती है।
कौटिल्य ने कहा था कि राज्य का पतन तब आरंभ होता है जब विद्वान सत्य बोलना छोड़ देते हैं और सत्ता प्रशंसा सुनने की अभ्यस्त हो जाती है। किसी भी राष्ट्र की शक्ति उसकी सेना या संपत्ति से नहीं मापी जाती; उसकी शक्ति इस बात से मापी जाती है कि वहाँ सत्य बोलने की कितनी स्वतंत्रता है।
न्यायपालिका लोकतंत्र का मंदिर कही जाती है। किंतु मंदिर की पवित्रता केवल उसके ऊँचे शिखरों से सिद्ध नहीं होती; वह उसके भीतर बैठे लोगों के आचरण से सिद्ध होती है। न्याय केवल निर्णय नहीं होता, न्याय विश्वास होता है। और जब समाज के भीतर न्याय को लेकर प्रश्न उठने लगें, तब उन प्रश्नों को दबाने से अधिक आवश्यक है आत्ममंथन करना।
यह भी सत्य है कि भ्रष्टाचार केवल रिश्वत का नाम नहीं है।भ्रष्टाचार तब भी होता है जब न्याय वर्षों तक फाइलों में कैद रहे। भ्रष्टाचार तब भी होता है जब गरीब व्यक्ति तारीखों के बोझ तले बूढ़ा हो जाए।भ्रष्टाचार तब भी होता है जब व्यवस्था आलोचना को शत्रु मानने लगे।
लोकतंत्र में संस्थाओं का सम्मान आवश्यक है, परंतु सम्मान और भय एक ही चीज नहीं हैं। जहाँ प्रश्न पूछना अपराध बन जाए, वहाँ लोकतंत्र धीरे-धीरे औपचारिकता बन जाता है।आज भारत का सबसे बड़ा संकट आर्थिक नहीं, वैचारिक है।
युवाओं के भीतर डिग्रियाँ हैं, पर अवसर नहीं।आँखों में सपने हैं, पर व्यवस्था पर विश्वास नहीं।और जब व्यवस्था संवाद के स्थान पर उपदेश देने लगे, तब असंतोष जन्म लेता है।इतिहास के प्रत्येक निर्णायक मोड़ पर दो प्रकार के लोग खड़े दिखाई देते हैं ,पहले वे, जो सुविधा बचाने के लिए मौन हो जाते हैं।दूसरे वे, जो सत्य बचाने के लिए अकेले खड़े हो जाते हैं।पहले प्रकार के लोग सफल अवश्य दिखाई देते हैं, पर इतिहास उन्हें याद नहीं रखता।दूसरे प्रकार के लोग संघर्ष झेलते हैं, उपहास सहते हैं, दंडित होते हैं — किंतु वही आने वाले समय की चेतना बनते हैं।
भगत सिंह ने फांसी से पहले क्षमा याचना नहीं की थी। क्योंकि कुछ व्यक्तित्व जीवन की लंबाई से नहीं, विचारों की ऊँचाई से अमर होते हैं।आज आवश्यकता किसी अराजक विद्रोह की नहीं, बल्कि वैचारिक निर्भीकता की है। राष्ट्र को ऐसे नागरिक चाहिए जो संस्थाओं से घृणा नहीं, परंतु उनसे प्रश्न पूछने का साहस रखें। जो न्यायपालिका का सम्मान करें, किंतु न्याय के नाम पर मौन रहने को बाध्यता न मानें। जो सत्ता का विरोध केवल विरोध के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रहित में करें।
क्योंकि अंततः मनुष्य की सबसे बड़ी विजय पद, वेतन और सुविधा नहीं होती।सबसे बड़ी विजय यह होती है कि वह रात को आईने में अपनी आँखों में देख सके और स्वयं से कह सके ,“मैं बिका नहीं। मैं डरा नहीं। मैं झुका नहीं।”
इतिहास में जीवित वही रहते हैं जो सत्य के लिए खड़े होते हैं।बाकी लोग केवल जन्म लेते हैं, जीवन बिताते हैं और धीरे-धीरे भुला दिए जाते हैं।
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