सूचना का अधिकार और लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति : सरकार करे समीक्षा और सुधार
डॉ दिव्या तिवारी, प्रबंध सम्पादक, कौटिल्य का भारत, 4अप्रेल 26,समय 5.10
भारत के लोकतांत्रिक विकास की यात्रा में पारदर्शिता और जवाबदेही का प्रश्न हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है। औपनिवेशिक काल से लेकर स्वतंत्र भारत तक शासन प्रणाली में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन जनता को शासन के कार्यों की जानकारी प्राप्त करने का वास्तविक अधिकार बहुत देर से मिला। वर्ष 2005 में लागू हुआ सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act) भारतीय लोकतंत्र की उस ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में सामने आया जिसने आम नागरिक को शासन से प्रश्न पूछने और जवाब मांगने की वैधानिक शक्ति प्रदान की। आज समय की मांग है कि सरकार इस कानून की व्यापक समीक्षा करे, इसके प्रभाव का आकलन करे और इसे और अधिक प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक सुधार करे।
औपनिवेशिक काल से सूचना के अधिकार तक की यात्रा यदि इतिहास पर दृष्टि डालें तो अंग्रेजों के शासनकाल में प्रशासनिक गोपनीयता को सर्वोच्च महत्व दिया जाता था। 1905 के आसपास की शासन व्यवस्था में प्रशासनिक जानकारी को जनता से पूरी तरह छिपाकर रखा जाता था। उस समय शासन की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता का कोई स्थान नहीं था। सरकारी दस्तावेजों और निर्णयों तक आम जनता की पहुँच लगभग असंभव थी।स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी कई दशकों तक प्रशासनिक ढांचा औपनिवेशिक सोच से मुक्त नहीं हो पाया। सरकारी विभागों में गोपनीयता की संस्कृति बनी रही। भ्रष्टाचार, लालफीताशाही और प्रशासनिक मनमानी के कारण जनता में असंतोष बढ़ता गया।
इसी पृष्ठभूमि में 1990 के दशक में राजस्थान और अन्य राज्यों में जन आंदोलनों ने पारदर्शिता की मांग को तेज किया। मजदूरों और किसानों के आंदोलनों ने यह सवाल उठाया कि यदि सरकार जनता के पैसों से चलती है तो जनता को यह जानने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए कि पैसा कहाँ और कैसे खर्च हो रहा है।इन आंदोलनों के दबाव और लोकतांत्रिक चेतना के विस्तार के परिणामस्वरूप वर्ष 2005 में सूचना का अधिकार अधिनियम लागू हुआ। यह अधिनियम भारतीय लोकतंत्र में एक क्रांतिकारी कदम साबित हुआ।
सूचना का अधिकार : लोकतंत्र की वास्तविक शक्तसूचना का अधिकार अधिनियम 2005 ने पहली बार देश के आम नागरिक को यह अधिकार दिया कि वह किसी भी सरकारी विभाग से सूचना मांग सकता है।इस कानून की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह नागरिक को सरकार के कामकाज की समीक्षा करने की शक्ति देता है। संविधान में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को शासन संचालन की जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन सूचना का अधिकार अधिनियम ने नागरिक को भी लोकतंत्र का सक्रिय प्रहरी बना दिया।
अब कोई भी नागरिक पूछ सकता है कि—
सरकारी योजना पर कितना खर्च हुआ
किस अधिकारी ने कौन सा निर्णय लिया
किसी परियोजना में देरी क्यों हुई
सरकारी नियुक्तियों और ठेकों में प्रक्रिया क्या अपनाई गई
इस प्रकार यह कानून लोकतंत्र को केवल प्रतिनिधिक प्रणाली से आगे बढ़ाकर सहभागी लोकतंत्र की दिशा में ले जाता है।
भ्रष्टाचार पर प्रभाव सूचना का अधिकार लागू होने के बाद देश में पारदर्शिता की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिले।कई राज्यों में सरकारी योजनाओं में हुए बड़े घोटाले उजागर हुए।राशन वितरण, मनरेगा, पेंशन योजनाओं और विकास कार्यों में अनियमितताओं का खुलासा हुआ।
अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही बढ़ी।हालाँकि भ्रष्टाचार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि सूचना के अधिकार के कारण कई क्षेत्रों में भ्रष्टाचार में उल्लेखनीय कमी आई है। सरकारी अधिकारियों को अब यह डर रहता है कि कोई भी नागरिक किसी भी समय उनके निर्णयों से जुड़ी जानकारी मांग सकता है।यह कानून प्रशासनिक तंत्र पर एक नैतिक दबाव भी बनाता है कि वह नियमों के अनुसार कार्य करे।
सूचना कार्यकर्ताओं की भूमिका सूचना का अधिकार केवल एक कानून नहीं है; यह एक सामाजिक आंदोलन भी है। देश में हजारों ऐसे नागरिक हैं जो नियमित रूप से आरटीआई के माध्यम से जनहित के मुद्दे उठाते हैं।इन सूचना कार्यकर्ताओं ने—सरकारी योजनाओं की निगरानी की,भ्रष्टाचार को उजागर कियाजनता के अधिकारों की रक्षा की,कई मामलों में तो सूचना कार्यकर्ताओं ने अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा को जोखिम में डालकर भी जनहित के मुद्दों को सामने लाया है। इसलिए यह आवश्यक है कि सरकार ऐसे लोगों के योगदान को पहचाने और उन्हें सम्मानित करे।
सरकार को क्या करना चाहिएअब लगभग दो दशक बीतने के बाद समय आ गया है कि सरकार सूचना का अधिकार अधिनियम की समग्र समीक्षा करे। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं। अच्छे सूचना कार्यकर्ताओं को सम्मान,जो लोग आरटीआई के माध्यम से जनहित में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं उन्हें “वैचारिक योद्धा” या “वैचारिक सेनानी” जैसे सम्मान से नवाजा जा सकता है। इससे समाज में सकारात्मक प्रेरणा मिलेगी। पारदर्शिता को संस्थागत रूप देना,सरकारी विभागों को अधिकतम जानकारी स्वतः सार्वजनिक करनी चाहिए ताकि नागरिकों को बार-बार आरटीआई लगाने की आवश्यकता ही न पड़े। दुरुपयोग पर नियंत्रण
कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि कुछ लोग व्यक्तिगत विवाद या अनावश्यक दबाव बनाने के लिए आरटीआई का उपयोग करते हैं। ऐसे मामलों में स्पष्ट दिशा-निर्देश और दंडात्मक प्रावधान होने चाहिए ताकि कानून का दुरुपयोग न हो। सूचना आयोगों को मजबूत करना,कई राज्यों में सूचना आयोगों में लंबित मामलों की संख्या बहुत अधिक है। आयोगों को पर्याप्त संसाधन और कर्मियों की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
डिजिटल पारदर्शिता डिजिटल तकनीक के माध्यम से सरकारी सूचनाओं को ऑनलाइन उपलब्ध कराने से पारदर्शिता और बढ़ सकती है।लोकतंत्र की नई परिकल्पना सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 वास्तव में जनता के हाथों में दी गई पहली वास्तविक प्रशासनिक शक्ति है। यह कानून नागरिक को केवल मतदाता नहीं बल्कि शासन का सक्रिय सहभागी बनाता है।यदि इस कानून को सही ढंग से लागू किया जाए तो यह—भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा सकता है,प्रशासन को जवाबदेह बना सकता है,लोकतंत्र को मजबूत कर सकता हैयह कानून हमें यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं है; लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है जनता की निरंतर भागीदारी और निगरानी।
सूचना का अधिकार अधिनियम भारतीय लोकतंत्र की एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह कानून नागरिकों को सरकार के कार्यों की समीक्षा करने का अधिकार देता है और शासन को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाता है।
आज आवश्यकता है कि सरकार इस कानून की व्यापक समीक्षा करे, इसे और अधिक प्रभावी बनाए तथा जनहित में काम करने वाले सूचना कार्यकर्ताओं को सम्मानित करे। साथ ही कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए भी उचित प्रावधान किए जाएँ।
यदि ऐसा किया जाता है तो सूचना का अधिकार अधिनियम केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं रहेगा बल्कि वास्तविक लोकतंत्र की आधारशिला बन जाएगा—जहाँ सरकार और जनता के बीच विश्वास, पारदर्शिता और जवाबदेही का मजबूत संबंध स्थापित होगा। यही वह मार्ग है जो भारत को सशक्त, पारदर्शी और जागरूक लोकतंत्र की दिशा में आगे बढ़ा सकता है।
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