वन्देमातरम 77 श्रृंखला
वन्दे मातरम दलित चेतना क़ी अस्मिता, समानता और सामाजिक न्याय की मांग।
द्वंद्व का केंद्र: जहाँ एक ओर यह गीत राष्ट्रवाद का प्रतीक बना, वहीं दूसरी ओर दलित और बहुजन चिंतकों ने इसमें निहित 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' और 'ब्राह्मणवादी प्रतीकों' पर प्रश्न उठाए। ऐतिहासिक संदर्भ और साहित्य आनंदमठ की पृष्ठभूमि: उपन्यास में सन्यासी विद्रोह और उसके भीतर का धार्मिक स्वर।
राष्ट्रवाद बनाम जातिवाद: भारत सरकार के सांस्कृतिक पोर्टल पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान यह गीत एकता का सूत्र था, लेकिन ज्योतिबा फुले और डॉ. अंबेडकर के साहित्य में राष्ट्र की परिभाषा 'जाति-मुक्त समाज' के रूप में थी।
वैचारिक टकराहट के बिंदु
प्रतिमा विज्ञान, गीत में मातृभूमि को 'दुर्गा' या 'लक्ष्मी' के रूप में चित्रित किया गया है। दलित साहित्य (जैसे ओमप्रकाश वाल्मीकि या तुलसीराम की रचनाएं) इन प्रतीकों को उच्च वर्णीय मिथकों के रूप में देखता है, जिनसे दलित समुदाय ऐतिहासिक रूप से बाहर रहा है। समावेशिता का प्रश्न: क्या 'वन्दे मातरम' का राष्ट्र सभी जातियों को समान गरिमा देता है? दलित चेतना इस गीत की 'सांस्कृतिक शुद्धता' पर सवाल उठाती है।
प्रमुख दलित साहित्यकारों का दृष्टिकोण
डॉ. बी.आर. अंबेडकर: उनके लेखन में उस राष्ट्रवाद की आलोचना है जो आंतरिक सुधार (जाति उन्मूलन) से पहले राजनीतिक स्वतंत्रता की बात करता है। आधुनिक दलित कवियों की रचनाओं में 'वन्दे मातरम' के समानांतर 'जय भीम' या 'हुंकार' के स्वर मिलते हैं, जो राष्ट्र को भौगोलिक इकाई के बजाय मानवीय गरिमा के रूप में देखते हैं।
राष्ट्रगान (जन गण मन) बनाम वन्दे मातरम: दलित विमर्श में अक्सर 'जन गण मन' को अधिक समावेशी माना जाता है क्योंकि इसमें भौगोलिक विविधता है, जबकि 'वन्दे मातरम' में धार्मिक-सांस्कृतिक बिम्ब प्रधान हैं।अछूत का राष्ट्र: दलित साहित्य अकादमी जैसे मंचों पर उपलब्ध विमर्श के अनुसार, राष्ट्रवाद तभी सार्थक है जब वह अंतिम व्यक्ति को स्वीकार्य हो।
साहित्यिक धरातल पर 'वन्दे मातरम' एक उत्कृष्ट काव्य रचना है, लेकिन दलित चेतना के संदर्भ में यह एक 'अधूरे राष्ट्रवाद' का संकेत देती है जब तक कि सामाजिक समानता सुनिश्चित न हो।वर्तमान साहित्य इन दोनों के बीच संवाद की आवश्यकता पर बल देता है।
आनंदमठ का दार्शनिक आधार और दलित प्रश्न
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का 'आनंदमठ' केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि उन्नीसवीं सदी के बंगाल के 'भ्रद्रलोक' मानस का प्रतिबिंब है।सन्यासी विद्रोह की व्याख्या: उपन्यास में जिस सन्यासी विद्रोह का चित्रण है, अंबेडकरवादी दृष्टिकोण से वह एक 'पुनरुत्थानवादी' आंदोलन है। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, बंकिम का उद्देश्य औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध एक सांस्कृतिक चेतना जागृत करना था, लेकिन इस चेतना का आधार 'वर्ण-व्यवस्था' का समर्थन करने वाला सनातनी ढांचा था। उपन्यास के मुख्य पात्र 'भवानंद' या 'महेंद्र' उच्च वर्णीय पृष्ठभूमि से हैं। इसमें उस दौर के दलितों या 'नमोशूद्रों' के शोषण पर मौन साधा गया है, जो अकाल में सबसे अधिक प्रभावित थे।
वन्दे मातरम: एक गीत, कई व्याख्याएँ
गीत के शब्द "सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्" प्रकृति की वंदना करते हैं, जो निर्विवाद है। किंतु विवाद तब शुरू होता है जब भूमि का मानवीकरण 'हिंदू देवी' के रूप में किया जाता है।मूर्ति पूजा और अंबेडकरवाद: डॉ. अंबेडकर ने तार्किकता और निराकार मानवीय मूल्यों पर जोर दिया। अंबेडकरवादी चिंतक मानते हैं कि 'वन्दे मातरम' में देश को 'माँ' मानकर उसकी पूजा करना वैज्ञानिक सोच के विपरीत एक भावुकतावादी राष्ट्रवाद है, जो दलितों को फिर से उसी पौराणिक चक्र में धकेलता है जिससे वे मुक्त होना चाहते हैं।
अधिकार बनाम वंदना: दलित साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि के विचारों के आलोक में देखें तो, जो समाज दलित को 'मनुष्य' नहीं मानता, वह उससे 'भूमि की वंदना' की अपेक्षा कैसे कर सकता है?
अंबेडकर का 'राष्ट्रवाद' और वन्दे मातरम की सीमाएं
डॉ. अंबेडकर का राष्ट्रवाद 'क्षेत्र' से नहीं 'जनता' से शुरू होता था।
सामाजिक लोकतंत्र: अंबेडकर के लिए राष्ट्र "बंधुत्व का दूसरा नाम" था। उनके अनुसार, 'वन्दे मातरम' जैसे गीत राष्ट्र के एक बड़े वर्ग (अछूतों और अल्पसंख्यकों) को मनोवैज्ञानिक रूप से अलग-थलग कर सकते हैं क्योंकि इसके बिम्ब एक विशिष्ट धार्मिक संस्कृति से संचालित हैं।
संविधान बनाम आनंदमठ: में स्पष्ट है कि अंबेडकर ने एक ऐसे भारत की कल्पना की जो 'स्मृतियों' से नहीं 'संविधान' से चले। आनंदमठ का राष्ट्रवाद 'अतीत' की ओर देखता है, जबकि अंबेडकर का राष्ट्रवाद 'भविष्य' की न्यायपूर्ण व्यवस्था की ओर देखता है.
साहित्य में प्रतिरोध के स्वर
आधुनिक दलित कविता में 'वन्दे मातरम' के प्रति एक आलोचनात्मक दूरी दिखाई देती है। अस्मिता का संघर्ष: दलित कविता कहती है— "जिस धरती पर मेरा पसीना गिरा, वह मेरी है, पर जिस पर मेरा अपमान हुआ, उसकी वंदना मैं कैसे करूँ?"प्रति-नायक: आनंदमठ के 'संन्यासी' नायकों के विपरीत, दलित साहित्य 'चोखामेला' और 'रविदास' जैसे संतों को अपना नायक मानता है, जिन्होंने ईश्वर से भी समानता का प्रश्न पूछा।:क्या वन्दे मातरम और दलित चेतना के बीच कोई अभी मेल संभव है?
यह तभी संभव है जब हम गीत को उसकी 'सांप्रदायिक व्याख्या' से मुक्त कर 'प्राकृतिक और भौगोलिक प्रेम' तक सीमित रखें।किंतु, 'आनंदमठ' का मूल स्वर चूंकि वर्चस्ववादी है, इसलिए अंबेडकरवादी चेतना हमेशा इसके प्रति सतर्क और आलोचनात्मक रहेगी।
वन्दे मातरम, आनंदमठ और अंबेडकरवादी चेतना के त्रिकोण पर आधारित यह एक अति-विस्तृत विमर्श है.अम्बेडकर वन्देमातरम मातरम से पहले संविधान क़ो मानते है.
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