जय कांग्रेस वंश: कौटिल्य की दृष्टि में मीडिया और विषबेल
कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में स्पष्ट कहा था—
“राज्य का सबसे बड़ा शत्रु बाहरी आक्रमण नहीं, बल्कि आंतरिक भ्रम होता है।”आज भारतीय लोकतंत्र उसी भ्रम से जूझ रहा है, और उस भ्रम का सबसे शक्तिशाली औज़ार बन गया है—मुख्यधारा का मीडिया।गांधी परिवार भारतीय राजनीति में एक वंश है—विचार नहीं। किंतु मीडिया ने इस वंश को वर्षों से नेतृत्व, नैतिकता और लोकतंत्र का पर्याय बना रखा है। सोशल मीडिया पर जहां यह वंश तीखे सवालों के घेरे में है, वहीं टीवी स्टूडियो और अख़बारों के पहले पन्ने अब भी उसकी परिक्रमा में लगे हैं। कौटिल्य इसे “मिथ्या-प्रतिष्ठा का निर्माण” कहते थे। यह कोई रहस्य नहीं कि बड़े मीडिया संस्थानों के आर्थिक और संस्थागत हित कांग्रेस शासन की पुरानी छाया में पले-बढ़े। कौटिल्य ने ऐसे वर्ग को “उपजीवी शक्तियाँ” कहा था—जो सत्ता बदलने पर भी अपने हित सुरक्षित रखने के लिए कथानक बदल लेते हैं। आज वही मीडिया, सत्ता से सीधी टकराहट के भय में, कमज़ोर विपक्ष को नैतिक आवरण ओढ़ा रहा है। मजबूत सत्ता उनके लिए जोखिम है, कमजोर विपक्ष—सुरक्षित निवेश।
राहुल गांधी का विदेश जाकर यह कहना कि “भारत में लोकतंत्र खतरे में है”, कौटिल्य की भाषा में “पर-राज्य में स्व-राज्य की निंदा” है—जिसे उन्होंने राज्यद्रोह नहीं, लेकिन अविवेकपूर्ण राजनीति कहा। इसके बावजूद, मीडिया इसे साहसिक वक्तव्य बनाता है। वहीं भारत की जी-20 अध्यक्षता, वैश्विक मंच पर कूटनीतिक सफलता और राष्ट्रीय प्रतिष्ठा—सबको अपेक्षित महत्व नहीं मिलता। यह चयन कौटिल्य के अनुसार सूचना-युद्ध में पक्षपात है।
प्रियंका गांधी के प्रत्येक बयान को ऐतिहासिक घटना की तरह प्रस्तुत किया जाता है, जबकि ज़मीनी राजनीति में कांग्रेस का क्षरण निर्विवाद है। सर्वेक्षण और चुनाव परिणाम स्पष्ट कहते हैं—लोकप्रियता वंश से नहीं, प्रदर्शन से तय होती है। कौटिल्य ने कहा था—“प्रजा भाव से राज्य चलता है, प्रचार से नहीं।”फिर भी मीडिया प्रचार को भाव बना देने का दुस्साहस कर रहा है।
यह प्रश्न अनिवार्य है—क्या मीडिया डरता है? लाइसेंस, जांच, विज्ञापन और सत्ता-समीकरण का भय? कौटिल्य ने ऐसे भयभीत वर्ग को “भृतक बुद्धि” कहा—जो सत्य नहीं, सुविधा का पक्ष लेता है। लेकिन उन्होंने चेतावनी भी दी थी कि भय सेसंचालित सूचना व्यवस्था अंततः राज्य को कमजोर करती है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं की विवशता समझी जा सकती है। संगठन टूट रहा है, तो वंश ही अंतिम सहारा दिखता है। किंतु मीडिया का यह आग्रह—वंश को विचार, चेहरा को नेतृत्व और स्मृति को भविष्य बनाना—राजनीतिक अधर्म है। यह जनता की विवेकशीलता का अपमान और लोकतंत्र के स्वास्थ्य पर प्रहार है।
कौटिल्य के लिए नेतृत्व का मापदंड स्पष्ट था—योग्यता, कर्म और परिणाम। वंश उनका विकल्प नहीं था। राहुल और प्रियंका गांधी को इतिहास रचने वाले नेताओं की पंक्ति में खड़ा करना, उन नेताओं के परिश्रम का अपमान है जिन्होंने संगठन, संघर्ष और सेवा से जनविश्वास अर्जित किया। आज भारतीय मीडिया एक चौराहे पर खड़ा है। कौटिल्य की दृष्टि में यह धर्म-परीक्षा का क्षण है। या तो वह तथ्य, राष्ट्र और विवेक के साथ खड़ा होगा, या फिर वंशवाद की विषबेल को सींचते हुए लोकतंत्र को भीतर से खोखला करेगा।
इतिहास बताता है—विषबेल अंततः वृक्ष को नहीं, अपनी ही जड़ को नष्ट करती है। मीडिया यदि समय रहते नहीं जागा, तो यह विनाश केवल राजनीति का नहीं, विश्वास का होगा।

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