लोकतंत्र की सलाखें और एक रानी का मौन
(महारानी गायत्री देवी और आपातकाल का अंधकार)
इतिहास केवल तिथियों का संग्रह नहीं होता, वह मनुष्यता की स्मृति भी होता है। जब-जब सत्ता अपनी सीमाओं को लाँघती है, इतिहास मौन नहीं रहता—वह किसी व्यक्ति, किसी घटना, किसी अपमान के माध्यम से अपनी आपत्ति दर्ज कराता है। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में आपातकाल ऐसा ही एक कालखंड है—जहाँ संविधान जीवित था, पर उसकी आत्मा कैद में थी।इसी कैदखाने में एक दिन राजसी गरिमा, स्त्री सम्मान और संसदीय स्वतंत्रता—तीनों को एक साथ तिहाड़ की सलाखों के भीतर धकेल दिया गया।उस स्त्री का नाम था—महारानी गायत्री देवी।
गायत्री देवी का जीवन किसी उपन्यास की तरह था—जहाँ सौंदर्य भी था, वै, और अंततः संघर्ष भी। 23 मई 1919 को कूच बिहार के राजपरिवार में जन्मी यह कन्या केवल एक रानी बनने के लिए नहीं आई थी, वह अपने समय की गवाही बनने आई थी।विश्व प्रसिद्ध पत्रिका वोग ने उन्हें संसार की सबसे सुंदर स्त्रियों में गिना, पर यह सौंदर्य शीशे की तरह नाजुक नहीं था—यह वैचारिक दृढ़ता से चमकता हुआ सौंदर्य था। लंदन के स्विस कॉटेज स्कूल में शिक्षा पाई, वही विद्यालय जहाँ इंदिरा गांधी भी पढ़ीं। इतिहास कई बार संयोगों के माध्यम से भविष्य के संघर्षों की नींव रख देता है।1940 में जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह से विवाह के बाद वे राजमाता बनीं। उनके चारों ओर सेवकों की कतार थी, वैभव की चकाचौंध थी, परंतु उन्होंने स्वयं को महलों की दीवारों में सीमित नहीं किया। जब भारत लोकतंत्र की ओर बढ़ रहा था, तब एक रानी ने भी लोकतंत्र की राह पकड़ ली।
सत्ता से संवाद नहीं, टकराव
1962 का लोकसभा चुनाव भारतीय राजनीति के इतिहास में एक निर्णायक क्षण था। स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर जयपुर से चुनाव लड़ते हुए गायत्री देवी ने जो विजय प्राप्त की, वह मात्र संख्याओं की विजय नहीं थी—वह एक वैचारिक उद्घोषणा थी।करीब दो लाख मतों से अधिक की यह जीत उस समय के किसी भी बड़े नेता से अधिक थी। यह जनता का संकेत था कि लोकतंत्र में वंश नहीं, विवेक चलता है।संसद में पहुँचकर उन्होंने शिष्टता नहीं छोड़ी, पर स्पष्टता से कभी समझौता नहीं किया। उनके शब्द सत्ता के गलियारों में गूँजते थे—कांग्रेस को असहज करते थे। वे जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के साथ खड़ी रहीं, क्योंकि उनके लिए लोकतंत्र किसी दल की बपौती नहीं, जनता की धरोहर था।
आपातकाल: जब देश एक भय में सिमट गया
25 जून 1975 की रात भारतीय लोकतंत्र के लिए एक लंबी, भयावह रात बन गई। आपातकाल घोषित हुआ—और उसके साथ ही स्वतंत्रता पर पहरा बैठ गया।अख़बारों की स्याही सूख गई, विपक्ष की आवाज़ बंद कर दी गई, और जेलों के दरवाज़े खोल दिए गए—पर अपराधियों के लिए नहीं, असहमत नागरिकों के लिए।इसी अंधकार में सत्ता ने तय किया कि कुछ नाम केवल हटाए नहीं जाएंगे, तोड़े जाएंगे।गायत्री देवी उन्हीं नामों में थीं।कानून का मुखौटा और प्रतिशोध का चेहरा भी,
जब गायत्री देवी मुंबई में इलाज करा रही थीं, उन्हें संदेश मिला—दिल्ली लौटने पर गिरफ्तारी तय है। यह चेतावनी थी, डराने का प्रयास था।पर वे लौटीं। संसद पहुँचीं। वहाँ खाली बेंचें थीं—मानो लोकतंत्र स्वयं अनुपस्थित हो।इसके बाद आयकर छापे, विदेशी मुद्रा के आरोप, COFEPOSA जैसे कठोर कानून—और अंततः गिरफ्तारी।आरोप इतने तुच्छ थे कि वे स्वयं अपनी व्यर्थता पर शर्मिंदा लगते थे। यह आर्थिक अपराध नहीं था, यह राजनीतिक प्रतिशोध का औपचारिक दस्तावेज़ था।तिहाड़: जहाँ गरिमा को दंड मिला.30 जुलाई 1975। तिहाड़ जेलगयी,बैरक संख्या चार।
जिस स्त्री ने जीवन में कभी अपमान की कल्पना नहीं की थी, उसे गंदगी, चूहों और भय के बीच डाल दिया गया। रातें चीखों से भर जाती थीं। आसपास अपराधियों की दुनिया थी—और बीच में एक रानी, जो अब केवल एक कैदी थी।शौचालय गड्ढा था, कमरा तंग था, और वातावरण अमानवीय।यह केवल शारीरिक कैद नहीं थी—यह मानसिक अपमान की निरंतर प्रक्रिया थी।बीमारी, उपेक्षा और मौन यातना भी,कारावास के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ गई। पित्ताशय की पथरी—तीव्र पीड़ा।अस्पताल ले जाया गया, पर वहाँ भी संवेदना नहीं थी—केवल औपचारिकता थी।राज्य यह सिद्ध करना चाहता था कि सत्ता के आगे कोई भी बड़ा नहीं—न सौंदर्य, न पद, न इतिहास।
156 रातें—हर रात एक प्रश्न:क्या लोकतंत्र इसी दिन के लिए था?रिहाई या आत्मसमर्पण?जनवरी 1976 में रिहाई मिली—पर शर्तों के साथ।याचिकाएँ वापस लो, राजनीति से दूर रहो, मौन स्वीकार करो।यह रिहाई नहीं थी, यह सत्ता का आग्रह था—कि विरोध अब समाप्त हो।गायत्री देवी ने राजनीति छोड़ी, पर आत्मसम्मान नहीं छोड़ा।इतिहास का निर्णय1977 में वही सत्ता जनता के सामने आई—और पराजित हुई।मतदान पेटियों ने बता दिया कि डर स्थायी नहीं होता।गायत्री देवी ने बाद में अपनी आत्मकथा “A Princess Remembers” में उस दौर को दर्ज किया—बिना चीख-पुकार के, पर गहरी टीस के साथ।29 जुलाई 2009 को उनका जीवन थम गया, पर उनकी कथा नहीं थमी।
स्मृति का दायित्व,महारानी गायत्री देवी की तिहाड़ यात्रा हमें यह सिखाती है किज ब सत्ता अहंकार में बदल जाती है, तब सबसे पहले वह सम्मान को कैद करती है।यह कथा किसी एक रानी की नहीं, यह लोकतंत्र की परीक्षा की कथा है।और हर पीढ़ी का दायित्व है कि वह इस स्मृति को जीवित रखे—ताकि कोई और रात, फिर से इतनी लंबी हो.
कांग्रेसी सावरकर की बात तो उठाते हैं लेकिन भारतीय जनता पार्टी पेपेटा नेपाल की राजशाही को उपदस्त करने और महारानी गायत्री जैसे असंख्य मामलों को क्यों नहीं उठाती क्या इतिहास से सीख नहीं लेना चाहती यह सुरक्षात्मक कृपया अपना करके ऐसे ही चलते रहो की काम में लगी रहती है.

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