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शनिवार, 25 अक्टूबर 2025

महामारी की ओर इंगित करता वेश्विक जलसंकट, जल साक्षरता का घोर आभाव

 


भारत में पानी की उपेक्षा, सरकारी बदनीयती, जल साक्षरता का अभाव, सामाजिक संस्थाओं की नकारात्मक भूमिका, और जल का वैदिक, पौराणिक व लौकिक महत्व - ये सभी विषय आज के जल-संकट की गंभीरता को रेखांकित करते हैं।पानी की उपेक्षा और सरकारी बदनीयतीभारत में विगत वर्षों में असंतुलित जल प्रबंधन, अंधाधुंध दोहन, ग्राम-शहर की योजनाओं की असफलता, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, योजनाओं का कागजी रह जाना और सहभागिता का अभाव - यह दिखाता है कि सरकारें जल की आवश्यकता को समझने और उसके गंभीर संरक्षण हेतु ईमानदार नहीं रहीं। 
नीति आयोग की रिपोर्टों तथा अन्य सरकारी और स्वतंत्र विश्लेषणों में विभिन्न राज्यों के जल प्रबंधन को 'असंतोषजनक' और बदनीयत बताया गया है। कई बार योजनाएँ जन-जागरण या संरक्षण की जगह राजनीतिक या एडमिनिस्ट्रेटिव गड़बड़ियों के कारण विफल हो जाती हैं.जल साक्षरता का अभाव भारतीय समाज में जल साक्षरता - यानि जल के महत्व, संरक्षण, पुनर्भरण, प्रदूषण की जानकारी और जिम्मेदारी - का गंभीर अभाव है। लोगों में यह समझ नहीं बन पाई कि जल सीमित और समाप्त होता संसाधन है.
 न स्कूलों में पर्याप्त जागरूकता, न ग्राम-नगर, कॉलोनियों में जल संरक्षण का सोशल कल्चर है। इससे जल की बर्बादी, दूषण व संकट बढ़ता है, साथ ही जल जीवन मिशन, जल बचाओ आंदोलन जैसी केन्द्र-राज्य योजनाएँ सामाजिक सहभागिता के अभाव में सीमित रह जाती हैं.जल की आवश्यकताजल जीवन का मूल है। कृषि, पशुधन, घरेलू पानी, पारिस्थितिक तंत्र, स्वास्थ्य - हर क्षेत्र जल पर निर्भर है।
 भारत की आबादी और कृषि-प्रधानता को देखते हुए जल सतत विकास का मूल है। किंतु सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश के कई राज्यों, बड़े शहरों में शीघ्र ही 'शून्य जल-दिवस' की संभावना बनती जा रही है
.सामाजिक संस्थाओं की नकारात्मक भूमिका,कई सामाजिक संगठन या तो सरकारी योजनाओं के प्रभाव में निष्क्रिय हैं या केवल क्रियाविहीन दिखावे तक सीमित हैं। जल संरक्षण को जन-अभियान बनाने की जरूरत है, लेकिन अधिकतर संस्थाएँ जल विषयक शिक्षा या 'कम्युनिटी वाटर मैनेजमेंट' को नजरअंदाज करती रही हैं, जबकि आम लोगों की भागीदारी सबसे जरूरी है
.वैदिक, पौराणिक व लौकिक महत्व,भारतीय वैदिक साहित्य में जल को जीवन, औषधि और पवित्रता का आधार कहा गया है। वेदों में जल को 'जीवन का स्रोत' और 'अमृत' बताया गया तथा जल प्रदूषण को मानवता का अपराध और 'पाप' माना गया है। नदियों को माता के रूप में पूजनीय बताया गया है। अथर्ववेद, यजुर्वेद, महाभारत, विष्णु पुराण इत्यादि में जल दान, जल संरक्षण, जल-समृद्धि की महति चर्चा है। आयुर्वेद में जल को स्वास्थ्य और रोग निवारण हेतु अमूल्य बताया गया है। गंगा जल का पौराणिक महत्व प्राणदायक व मोक्षदायी दोनों रूपों में स्थापित  है.संक्षेप में पानी को उपेक्षित करना, सरकारी स्तर पर ईमानदारी की कमी, समाज में जल साक्षरता का न होना, सामाजिक संस्थाओं की निष्क्रियता, और वैदिक-पौराणिक दृष्टिकोण से जल के वास्तविक स्थान की अनदेखी - ये मिलकर जल-संकट को महामारी बना रहे हैं। भारतीय ज्ञान-संस्कृति और जीवन-शास्त्र में जल जीवन का मूल है। इसे बचाना न केवल वैज्ञानिक, बल्कि सामाजिक, धार्मिक और वैश्विक उत्तरदायित्व भी है.यदि इसी दिशा में जागरूकता, नीति, और सामूहिक पुरुषार्थ न हुआ, तो जल-संकट निकट भविष्य की सबसे बड़ी आपदा बन सकता है। 

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