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मंगलवार, 30 सितंबर 2025

यदि समाज सेवा व्यवसाय है,तो राजनीति व्यवसाय क्यों नहीं?, भावेष पाण्डेय

 


बस्ती, उत्तरप्रदेश से भावेष पाण्डेय
अध्यक्ष, नेशनल एसोसिएशन आफ यूथ, भारत
 सेवा यदि व्यवसाय, तो राजनीति क्यों नहीं?धरती पर हर जीव की मूल आशा होती है—जीवन, सुख और मर्यादा। जब मनुष्यों का जीवन बनता है सहजीवन, तब जन्म लेता है समाज सेवा का पुण्य-कार्य। जैसे गंगा के जल में जीवन का अमृत है, वैसे ही समाज सेवा में जीवन का अर्थ है।समाज सेवा वह नदी है जो निर्मल जल लिए बसंत की तरह बहती है। हर मर्माहत हृदय को छूती है, हर दुःखी को आश्वासन देती है। इस सेवा में श्रम, समर्पण और कुछ आजीविका का भी स्थान है। 

क्योंकि बिना संसाधन के सेवा अधूरी है।आज का युग बड़ा चतुर है, जहां सेवा ने पाया है स्वरूप व्यवसाय का। गैर सरकारी संगठन, फाउंडेशन, अनुदान, वेतन—सब कुछ ओढ़ लिए हैं सेवा के वस्त्र। यह व्यवसाय नहीं तो क्या? मानवता की सेवा का यह व्यवसाय कठोर व्यापार-सरीखा है, जिसमें प्रबंध, ऑडिट, लक्ष्य सभी होते हैं।फिर प्रश्न उठता है—यदि समाज सेवा व्यवसाय हो सकता है, तो फिर राजनीति क्यों नहीं?राजनीति : धर्म भी, यज्ञ भीराजनीति एक अग्नि है, जो तपती और जलाती है। 
यह केवल सत्ता का संग्राम नहीं, बल्कि समाज के प्राणों की रक्षा का धर्म भी है। समाज सेवा जहां पानी की ठंडी बूंद सी मनोरम है, राजनीति सूर्य की ज्योति, निरंतर तपाशील है।गांधी ने इसे सत्य और अहिंसा की साधना कहा। उन्होंने कहा, “राजनीति सेवा का सर्वोच्च रूप है, यदि उसमें सत्कर्म और समर्पण हो।” राजनीति तो वह यज्ञ है जिसमें जनकल्याण के लिए हृदय-बलि चाहिए। पर विडम्बना देखो—जब सेवा को पवित्र माना जाता है, राजनीति को दूषित क्यों?राजनीति के मैदान में झूठ, धोखा, लड़ाई, और छल  होते हैं, इसलिए इसकी छवि धूमिल हुई। पर हे नर, छाया के बिना प्रकाश असंभव है। जहाँ शासन हो, परिवहन हो, शिक्षा हो, वहाँ राजनीति की जड़ें मजबूत होती हैं।
 सेवा केवल मरहम लगाना है, राजनीति वो औषधि है जो समाज के रोगों को जड़ से मिटाती है।समाज सेवा और राजनीति का मिलनसमाज सेवा और राजनीति दोनों रूप हैं एक ही मदिरा के। समाज सेवा चुपचाप मनुष्यों के घावों पर मरहम लगाती है, राजनीति संघर्ष भरे रणभूमि पर ध्वनि और आहट पैदा करती है।समाज सेवा में निधि, फंडिंग, और अभियान होते हैं। राजनीति में चुनाव, प्रस्ताव और निर्णय। पर अंततः दोनों को जीवित रखने वाले हैं—निष्ठा, परिश्रम और जनसंपर्क।ये दोनों गंगा और यमुना हैं, जो मिलकर भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और जनभावनाओं को आकार देते हैं। एक अमृत का सागर, दूसरा नीति और सत्ता का समुद्र।
 यदि इन दोनों का समन्वय हो, तो संपूर्ण राष्ट्र का विकास संभव होगा।उपसंहार : एक यज्ञ समान व्यवसायराजनीति और समाज सेवा, दोनों को समान स्थान देना होगा।
 यदि समाज सेवा व्यावसायिक हो सकती है, तो राजनीति भी उसी व्यवसाय से कम नहीं। अंतर केवल जनता की धारणा और इतिहास के भेद का है।राजनीति सृजन, संग्राम और समर्पण की मिली-जुली कला है। इसे व्यवसाय कहने में कोई अपमान नहीं, यदि उसमें सेवा का भाव बना रहे। कर्तव्य और धर्म का पथ राजनीति का मार्गदर्शक होना चाहिए.
क्या सरकारे स्वत: सज्ञान लेकर व्यवसाय घोषित करने की पहल करेंगी?

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