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शनिवार, 27 सितंबर 2025

संयुक्त राष्ट्र मे कूटनीतिक टकराव,एस जय शंकर का प्रहार!

 संयुक्त राष्ट्र मे कूटनीतिक टकराव,एस जय शंकर  का प्रहार!

दिल्ली

यूनाइटेड नेशन्स के हालिया मंच पर जो द्वंद्व दिखाई दिया, वह सिर्फ वाक्-युद्ध नहीं — बल्कि वैश्विक कूटनीति की एक छोटी-सी परीक्षा थी। बात की जड़ है तीन परतें: (1) सदस्य देशों के राष्ट्रीय/घरेलू राजनीतिक हित, (2) परम्परागत द्विपक्षीय विवादों का बहुपक्षिकरण, और (3) बहुलक-वर्ल्ड ऑर्डर में संस्थागत-सुधार की चर्चा जो अब गर्म हो चली है। उस संदर्भ में तुर्की-पाकिस्तान के सहानुभूति-संदेश और भारत की तीव्र प्रतिक्रिया दोनों को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। 



सबसे पहले: एर्दोगान का कश्मीर का ज़िक्र केवल पाकिस्तान को सांत्वना देने का साधन नहीं, बल्कि घरेलू और क्षेत्रीय संकेत भी था — यह दर्शाता है कि कुछ नेता बहुसंख्यक समर्थन और धार्मिक-राजनीतिक पहचान की रेखाओं को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी खींचकर उपयोग कर रहे हैं। इस तरह के हस्तक्षेप से एक सूक्ष्म लेकिन खतरनाक प्रवृत्ति जन्म लेती है: द्विपक्षीय विषयों का बहुपक्षिकरण, जिससे समाधान की जगह ध्रुवीकरण बढ़ता है। 


दूसरी परत — गुटारेस का UNSC सुधार का आह्वान — ने खेल का नियम बदला। जब महासचिव कहते हैं कि परिषद 1945 की दुनिया की झलक नहीं है और सुधार आवश्यक है, तो यह उन देशों के अभियान को वैधता देता है जो स्थायी सीटों के लिये दबाव बना रहे हैं। इस बयान ने भारत को न केवल तर्क पेश करने का मौका दिया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संरचनात्मक न्याय के नारों के साथ सामूहिक समर्थन जुटाने का अवसर भी। 


तीसरी परत में हम पाते हैं भारतीय कूटनीति की रणनीति: सार्वजनिक मोर्चे पर कड़ा जवाब और पृष्ठभूमि में सक्रिय द्विपक्षीय/बहुपक्षीय संवाद। विदेश मंत्री ने तुर्की के आरोपों का सांस्कृतिक-इतिहास और मानवाधिकारों की दृष्टि से प्रत्युत्तर देते हुए आरोपों को पलटा — यह प्रतिद्वन्द्वी के नैरेटिव को चुनौती देने का जानबूझकर प्रयुक्त औजार था। परन्तु सावधानी भी जरूरी है: 

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