धरती में सीता, जल में राम — एक मार्मिक एवं तर्कसंगत तात्विक अन्वेषण

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अयोध्या, सरयू, सीता और राम


धरती में सीता, जल में राम — एक मार्मिक एवं तर्कसंगत तात्विक अन्वेषण







दो तत्वों की एक कथा:अयोध्या केवल एक नगरी नहीं, एक तत्व-दर्शन है। उसकी छाती पर बहती सरयू और उसके सिंहासन पर विराजे राम — दोनों को अलग करके देखना असंभव है। ठीक वैसे ही, मिथिला की भूमि से प्रकट हुई सीता को धरती से पृथक करके समझना अधूरा ज्ञान होगा। भारतीय चिंतन पंचमहाभूतों — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — को सृष्टि का मूल आधार मानता है, और यह अत्यंत सार्थक है कि राम-कथा का आदि और अंत, दोनों ही इन्हीं दो तत्वों — पृथ्वी और जल — के इर्द-गिर्द रचे गए हैं। सीता पृथ्वी से प्रकट होती हैं और अंततः पृथ्वी में ही समा जाती हैं; राम सरयू के तट पर जन्म लेते हैं और अंततः सरयू में ही विलीन हो जाते हैं। यह संयोग नहीं, एक सुविचारित तात्विक संरचना है, जिसे इस आलेख में तर्क, शास्त्र और संवेदना तीनों के सहारे समझने का प्रयास किया गया है। जिस भूमि से सीता आईं, अंततः उसी में लौट गईं; जिस सरयू के तट पर राम ने जन्म लिया, अंततः उसी में समा गए — आदि और अंत का यह तात्विक सामंजस्य ही रामकथा की गहनतम संरचना है।



सीता — पृथ्वी की पुत्री: वैदिक और रामायण साक्ष्य::सीता का पृथ्वी से संबंध रामायण से भी प्राचीन है। ऋग्वेद के क्षेत्रपति सूक्त में 'सीता' शब्द हल की रेखा अर्थात कृषि-भूमि की अधिष्ठात्री देवी के रूप में वंदित है यह इस बात का प्रमाण है कि सीता मूलतः पृथ्वी और उर्वरता की वैदिक देवी थीं, जो कालांतर में जनकपुत्री के रूप में अवतरित हुईं।


अर्वाची सुभगे भव सीते वन्दामहे त्वा। यथा नः सुभगाऽसस्यथा नः सुफलाऽसस।।


अर्वाची सुभगे भव सीते, वन्दामहे त्वा।


हे सौभाग्यशालिनी सीते! तुम हमारे सम्मुख प्रकट हो, हम तुम्हारी वंदना करते हैं, जिससे हम सुभाग्य संपन्न और सुफल प्राप्त करने वाले हों।


— ऋग्वेद, क्षेत्रपति सूक्त, ४.५७



इसी वैदिक भाव को महर्षि वाल्मीकि ने बालकाण्ड में साकार किया। मिथिलानरेश जनक जब यज्ञभूमि को हल से जोत रहे थे, तब हल की नोंक से एक कन्या प्रकट हुई, जिसे राजा ने पुत्री रूप में स्वीकार किया। हल की रेखा को संस्कृत में 'सीता' कहा जाता है — अतः जनकपुत्री का नामकरण ही उनके पृथ्वी-सम्बन्ध का प्रत्यक्ष प्रमाण है। महर्षि विश्वामित्र को जनक स्वयं यह वृत्तान्त सुनाते हैं कि यज्ञभूमि शोधन के समय हल की नोंक से यह कन्या भूमि से उत्पन्न हुई, अतः उसका नाम 'सीता' रखा गया।


हलाग्रात् उत्थिता या तु मम कन्या स्वयंभुवा। भूमेः शोधनकाले तु सीतेति नाम ख्यापिता।।यज्ञभूमि के शोधन काल में हल की नोंक से जो कन्या स्वयं उत्पन्न हुई, वही मेरी कन्या है, जिसका नाम इसीलिए 'सीता' प्रसिद्ध हुआ।— वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, सर्ग ६६ (भावार्थ)



इस कारण सीता को शास्त्रों में 'भूमिजा', 'वसुधासुता' और 'जानकी' — तीनों नामों से संबोधित किया गया है। भूमिजा का अर्थ है भूमि से उत्पन्न, वसुधासुता का अर्थ है पृथ्वी की पुत्री। यह केवल जन्म-वृत्तान्त नहीं, अपितु उनके स्वभाव का भी सूचक है — पृथ्वी की भांति सीता में असीम सहनशीलता, क्षमाशीलता और धैर्य है। पृथ्वी हल की चोट सहकर अन्न देती है, सीता वनवास, अपहरण और अग्निपरीक्षा सहकर भी कभी अपना धैर्य नहीं छोड़तीं — यह पार्थिव तत्व की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है।




राम और सरयू — अयोध्या की जलधारा से आदि नाता::जिस प्रकार सीता का जन्म पृथ्वी से जुड़ा है, उसी प्रकार राम का समस्त जीवन सरयू के तट पर रचा-बसा है। वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के आरम्भिक सर्गों में ही अयोध्या नगरी का वर्णन सरयू नदी के तट पर बसी हुई नगरी के रूप में किया गया है। राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न — चारों भाइयों का जन्म इसी सरयू-तटवर्ती अयोध्या में हुआ, और उनके बाल्यकाल का हर स्मरण सरयू के जल से जुड़ा है।


सरय्वां तीरमाश्रित्य कोशलो नाम विषयः फलवान् धान्यको स्फीतो जनपदो महान्।।सरयू के तट पर बसा कोशल नाम का विशाल जनपद, फल-अन्न से समृद्ध और भरा-पूरा प्रदेश था — इसी में अयोध्या नगरी स्थित थी।— वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, सर्ग ५ (भावार्थ)



जल भारतीय दर्शन में प्रवाह, शुद्धिकरण और जीवनदान का तत्व माना गया है। राम का सम्पूर्ण चरित्र भी इसी प्रवाह-धर्म का प्रतिबिंब है — वे कभी स्थिर होकर सिंहासन नहीं थामते, अपितु धर्म की मर्यादा के प्रवाह में निरंतर बहते हैं। पिता की आज्ञा पाकर वन को प्रस्थान, सीता के लिए समुद्र पर सेतु-निर्माण, और अंततः प्रजाहित के लिए निजी सुख का त्याग — यह सब जल के उस स्वभाव के समान है जो कभी एक स्थान पर रुकता नहीं, अपितु सतत मर्यादा में बहकर सबका कल्याण करता है। यही कारण है कि राम को 'मर्यादा पुरुषोत्तम' कहा गया — मर्यादा शब्द का मूल अर्थ ही वह तटबंध है जिसमें नदी बहती है। यह भी विचारणीय है कि राम के नामकरण-संस्कार में भी जल की उपस्थिति केंद्रीय है — पुत्रेष्टि यज्ञ के पायस-प्रसाद से जन्म लेने के पश्चात नामकरण, जातकर्म और आगे के समस्त संस्कार सरयू के पवित्र जल से ही सम्पन्न होते हैं। अयोध्या के राजवंश की कुलपरम्परा में सरयू को केवल भौगोलिक नदी नहीं, अपितु कुलदेवी-तुल्य पवित्र सत्ता के रूप में पूजा जाता रहा है। इस दृष्टि से राम का जीवन आरम्भ से अंत तक सरयू की गोद में ही व्यतीत होता है — जन्म-संस्कार सरयू तट पर, राज्याभिषेक की तैयारियाँ सरयू तट पर, और अंतिम प्रस्थान भी सरयू के जल में।



वनवास और सेतु-बंध — जल जो साक्षी भी है, सेतु भी::राम-कथा में जल केवल पृष्ठभूमि नहीं, अपितु सक्रिय साक्षी और सहायक की भूमिका निभाता है। वनगमन के समय गंगा नदी को पार करते हुए निषादराज गुह की सहायता से राम, सीता और लक्ष्मण उस पार जाते हैं — यह गंगा-पार करना वस्तुतः गृहस्थ जीवन से वन-जीवन में संक्रमण का तात्विक द्वार बनता है। इसी प्रकार, सीता-हरण के पश्चात जब राम सीता की खोज में निकलते हैं, तब समुद्र ही वह अंतिम बाधा है जिसे लांघकर लंका तक पहुंचना है। नल-नील द्वारा निर्मित सेतु — जिस पर राम स्वयं के नाम के पत्थर तैरते हैं — जल पर धर्म और भक्ति की विजय का प्रतीक बन जाता है।

यहाँ एक गहन तर्क उभरता है — जल जो सीता से राम को पृथक करने का माध्यम बना (समुद्र पार लंका),वही जल अंततः सेतु बनकर उन्हें पुनः मिलाने का साधन भी बनता है। यह विरोधाभास नहीं, अपितु जल तत्व के दोहरे स्वभाव — विभाजन और संयोजन, दोनों — का सटीक चित्रण है, जो नदी के प्रवाह में भी दिखता है: नदी तट को अलग भी करती है और दोनों तटों को एक ही जलधारा से बांधती भी है।




सीता की पृथ्वी में वापसी — भूमि-प्रवेश का मार्मिक प्रसंग:उत्तरकाण्ड में वर्णित भूमि-प्रवेश प्रसंग रामकथा का सर्वाधिक करुण और तात्विक रूप से सर्वाधिक सारगर्भित प्रसंग है। जब लोकापवाद के कारण सीता को पुनः त्यागना पड़ा और वे वाल्मीकि आश्रम में महर्षि की शरण में रहकर लव-कुश का पालन करती हैं, तब अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर राम पुनः सीता को स्वीकार करने हेतु प्रस्ताव रखते हैं — किंतु इस बार सीता स्वयं निर्णय लेती हैं। वे किसी अग्निपरीक्षा या पुनः प्रमाण की प्रतीक्षा नहीं करतीं, अपितु सीधे अपनी माता पृथ्वी का आह्वान करती हैं। यथाहं राघवादन्यं मनसापि न चिन्तये। तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति।यथा अहम् राघवात् अन्यं मनसा अपि न चिन्तये। जिस प्रकार मैंने राघव (राम) के अतिरिक्त किसी अन्य का मन से भी चिंतन नहीं किया, उसी सत्य के आधार पर हे माधवी देवी (पृथ्वी माता)! आप मुझे अपने भीतर स्थान देने योग्य हों।— वाल्मीकि रामायण, उत्तरकाण्ड, सर्ग ९७ (भावार्थ)



सीता के इस सत्य-वचन के साथ ही पृथ्वी स्वयं विदीर्ण होती है, और भूमिदेवी एक दिव्य सिंहासन पर विराजमान होकर प्रकट होती हैं। वे सीता को अपनी गोद में बिठाकर पुनः धरती के गर्भ में समा जाती हैं। यह दृश्य केवल विदाई नहीं, अपितु एक पूर्णता है — जो पृथ्वी से आई, वह पूर्ण सत्यनिष्ठा और तप के साथ पुनः पृथ्वी में लौट गई। इसमें कोई पराजय नहीं, अपितु स्वयं की प्रामाणिकता की सर्वोच्च घोषणा है। सीता ने अग्नि से भी प्रमाण मांगा और पृथ्वी से भी शरण — दोनों ही बार उन्होंने स्वयं परीक्षा दी, स्वयं निर्णय लिया। यही उनका आदि शक्ति स्वरूप है — वे परीक्षार्थी कभी नहीं रहीं, वे स्वयं परीक्षा की अधिष्ठात्री रहीं। यह भी ध्यातव्य है कि सीता का भूमि-प्रवेश उनकी मृत्यु नहीं है — भारतीय शास्त्रों में देवी-स्वरूपा नारी के लिए मृत्यु शब्द का प्रयोग ही अनुचित है। यह एक ऐच्छिक, गरिमामय और सत्य-प्रमाणित प्रस्थान है, जिसमें सीता स्वयं समय, स्थान और विधि का निर्धारण करती हैं। इसकी तुलना यदि अग्निपरीक्षा से करें, तो अंतर स्पष्ट होता है — अग्निपरीक्षा में सीता को समाज के संशय का उत्तर देना पड़ा था, जबकि भूमि-प्रवेश में वे किसी को उत्तर नहीं देतीं, केवल अपनी सत्यनिष्ठा की अंतिम घोषणा करती हैं और स्वेच्छा से अपने मूल स्रोत में लौट जाती हैं। यह अंतर उनके चरित्र-विकास की पराकाष्ठा को दर्शाता है — वनगमन की सीता समाज के निर्णयों का पालन करने वाली राजवधू थीं, किंतु भूमि-प्रवेश की सीता स्वयं निर्णायक, स्वयं न्यायाधीश और स्वयं गंतव्य का निर्धारण करने वाली आदि शक्ति हैं। अध्यात्म रामायण और आनंद रामायण जैसे परवर्ती ग्रंथों में इस प्रसंग को और विस्तार मिला है, जहाँ सीता के भूमि-प्रवेश को उनके आदि शक्ति स्वरूप में पुनः विलीन होने के रूप में चित्रित किया गया है — अर्थात यह अंत नहीं, अपितु शक्ति का अपने मूल स्रोत में सायुज्य है। इन ग्रंथों की परंपरा को वाल्मीकि की मूल परंपरा से पृथक रखकर ही समझना उचित है, क्योंकि दोनों की व्याख्या-शैली और तात्विक बल भिन्न-भिन्न हैं।




राम की सरयू में जल-समाधि — मर्यादा पुरुषोत्तम का अंतिम प्रवाह:: जिस प्रकार सीता की कथा पृथ्वी में वापसी पर पूर्ण होती है, उसी प्रकार राम की कथा भी सरयू में वापसी पर ही पूर्ण होती है। वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड के अंतिम सर्गों में वर्णन आता है कि जब काल (महाकाल) स्वयं ऋषि दुर्वासा का रूप धरकर राम को यह स्मरण कराने आते हैं कि उनका पृथ्वी पर अवतार-कार्य पूर्ण हो चुका है, तब राम बिना विलंब किए अयोध्यावासियों, अपने भाइयों और समस्त प्रजा के साथ सरयू तट की ओर प्रस्थान करते हैं।ततो जगाम स रामः सरय्वास्तीरमुत्तमम्। ब्रह्मलोकं गमिष्यन्तं तमन्वीयुस्तदा प्रजाः।।तब राम सरयू के उत्तम तट की ओर गए। ब्रह्मलोक को जाते हुए उनके पीछे-पीछे समस्त प्रजा भी चल पड़ी। वाल्मीकि रामायण, उत्तरकाण्ड, सर्ग १११



राम अपने भाइयों और अनुयायियों सहित सरयू के जल में प्रविष्ट होते हैं, और वहीं अपने विष्णु-स्वरूप में विलीन हो जाते हैं। यह दृश्य किसी वियोग का नहीं, अपितु प्रवाह की पूर्णता का है। जिस सरयू के तट पर उनका जन्म हुआ, उसी सरयू के जल में उनका पुनरागमन — यह जल तत्व की उस मूल प्रकृति को दर्शाता है जो सदैव अपने स्रोत में लौटती है, ठीक वैसे ही जैसे नदी अंततः सागर में जाकर विलीन होती है। यहाँ एक सूक्ष्म किन्तु अत्यंत मार्मिक तथ्य ध्यान देने योग्य है — सीता की भूमि-प्रवेश और राम की जल-समाधि, दोनों ही घटनाएं उत्तरकाण्ड में घटित होती हैं, और दोनों में ही पात्र स्वयं अपनी इच्छा से, बिना किसी बाहरी विवशता के, अपने मूल तत्व में विलीन होने का निर्णय लेते हैं। सीता ने भूमि से प्रार्थना की, राम ने काल के आह्वान को स्वीकार किया — दोनों ही कृत्य आत्मनिर्णय के, विवशता के नहीं। यही कारण है कि रामकथा का अंत करुण होते हुए भी पराजय की नहीं, अपितु पूर्णता की गाथा है।




तात्विक विवेचना — पृथ्वी और जल के प्रतीकों में सीता-राम::भारतीय दर्शन में पृथ्वी तत्व को क्षमा, धैर्य, सहनशीलता और आधार का प्रतीक माना गया है, जबकि जल तत्व को प्रवाह, शुद्धता, मर्यादा और जीवनदान का प्रतीक माना गया है। यह अत्यंत सार्थक है कि रामकथा के दोनों प्रमुख पात्र इन्हीं दो तत्वों के मूर्त रूप हैं। सीता में पृथ्वी का धैर्य है — वे अग्निपरीक्षा, वनवास, अपहरण, पुनः त्याग — इन सबको सहते हुए भी अपना संतुलन नहीं खोतीं, ठीक वैसे ही जैसे पृथ्वी हल की चोट, वर्षा का प्रहार और सूर्य का ताप — सब सहकर भी स्थिर रहती है और अन्न देती रहती है। राम में जल का मर्यादा-धर्म है — वे कभी स्थिर सत्ता-सुख में नहीं बंधते, अपितु धर्म की मर्यादा में निरंतर प्रवाहित रहते हैं, जनकल्याण के लिए व्यक्तिगत सुख को त्यागते हुए। यह भी उल्लेखनीय है कि दोनों तत्व परस्पर पूरक हैं — पृथ्वी बिना जल के ऊसर रह जाती है, जल बिना पृथ्वी के आकारहीन बहता रहता है। सीता और राम का संयोग भी इसी परस्पर पूरकता का प्रतीक है — सीता राम को आधार और स्थिरता देती हैं, राम सीता को गति और प्रवाह देते हैं। यही कारण है कि रामायण में जहाँ भी राम अकेले होते हैं, वहाँ कथा में एक अपूर्णता का भाव रहता है, और सीता-सान्निध्य में ही राम-चरित्र पूर्ण प्रतीत होता है। एक और गहन तर्क यह है कि दोनों का अंतिम प्रस्थान भी परस्पर पूरक क्रम में होता है — पहले सीता पृथ्वी में समाती हैं, और वर्षों पश्चात राम जल में। यदि यह क्रम उलट होता — अर्थात राम पहले प्रस्थान करते — तो कथा सीता के एकाकी शोक में सिमट जाती। किंतु सीता का पूर्व-प्रस्थान यह दर्शाता है कि आदि शक्ति स्वरूपा सीता समय के प्रवाह से ऊपर हैं, वे प्रतीक्षा में नहीं बंधतीं; वहीं राम अपने मर्यादा-धर्म के अनुसार तब तक रुकते हैं जब तक प्रजा-कल्याण का कार्य पूर्ण न हो जाए, और कार्य पूर्ण होते ही वे भी अपने मूल तत्व — जल — में लौट जाते हैं।



विविध रामायण-परंपराओं में यह भाव::गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस में भूमि-प्रवेश और जल-समाधि, दोनों प्रसंगों का विस्तार वाल्मीकि रामायण की तुलना में अपेक्षाकृत संक्षिप्त है, क्योंकि मानस का केंद्रीय भाव भक्ति है, न कि विरह-वियोग का विस्तार। तुलसीदास जी राम के अवतार-कार्य की दिव्यता पर अधिक बल देते हैं। इसके विपरीत, अद्भुत रामायण और आनंद रामायण जैसे शाक्त-प्रभावित ग्रंथों में सीता के आदि शक्ति स्वरूप और उनकी भूमि में वापसी को कहीं अधिक विस्तार और तात्विक गरिमा के साथ चित्रित किया गया है, जहाँ सीता का भूमि-प्रवेश उनके मूल दिव्य स्वरूप में पुनर्मिलन के रूप में प्रस्तुत होता है।

कम्ब रामायण (तमिल परंपरा) और कृत्तिवासी रामायण (बांग्ला परंपरा) में भी सीता-राम के तत्व-सम्बन्धी प्रतीकों को क्षेत्रीय सांस्कृतिक भावों के साथ नए रूप में गूंथा गया है, यद्यपि मूल तात्विक ढांचा — सीता का भूमि से सम्बन्ध और राम का जल से सम्बन्ध — सभी परंपराओं में समान रूप से स्थिर रहता है। यह स्थिरता ही इस तात्विक संरचना की प्रामाणिकता और गहराई को प्रमाणित करती है। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि आधुनिक रचनात्मक पुनर्कथन (जैसे लोकप्रिय उपन्यास-साहित्य) इस विवेचन का आधार नहीं हैं — यह सम्पूर्ण विश्लेषण शास्त्रीय स्रोतों पर ही आधारित है।




सीतायण के परिप्रेक्ष्य से — आदि शक्ति की सनातन गति::सीतायण' की मूल दृष्टि यही है कि सीता कभी परिस्थितियों की शिकार नहीं रहीं, अपितु प्रत्येक निर्णय की सूत्रधार रहीं — चाहे वह अग्निपरीक्षा हो, वनगमन का आग्रह हो, या अंततः भूमि में वापसी हो। इसी दृष्टि से देखें तो भूमि-प्रवेश कोई दुखांत नहीं, अपितु आदि शक्ति का अपनी सनातन गति में लौटना है। पृथ्वी कभी नष्ट नहीं होती, वह केवल रूप बदलती है — बीज मिट्टी में जाकर पुनः अंकुरित होता है, वर्षा जल पृथ्वी में समाकर पुनः नदी बनकर बहता है। इसी प्रकार सीता का भूमि-प्रवेश भी अंत नहीं, अपितु एक सनातन चक्र का भाग है, जिसमें शक्ति कभी क्षीण नहीं होती, केवल अपने मूल स्रोत में विश्राम पाती है।इसी प्रकार राम की जल-समाधि को भी पराजय या शोक के रूप में नहीं, अपितु मर्यादा-धर्म की पूर्ण परिणति के रूप में देखा जाना चाहिए। जल कभी सूखता नहीं, वह केवल रूप बदलकर पुनः वर्षा बनकर लौटता है। राम का सरयू में विलय भी उनके धर्म-प्रवाह के अनवरत बने रहने का प्रतीक है — वे भौतिक रूप से अदृश्य हुए, किंतु उनका मर्यादा-आदर्श आज भी भारतीय जनमानस में उतनी ही शक्ति से प्रवाहित है, जितना त्रेता युग में था। धरती और जल — दोनों नष्ट नहीं होते, केवल रूप बदलते हैं। सीता और राम की कथा भी इसी सत्य की सबसे मार्मिक अभिव्यक्ति है — वे अंत को प्राप्त नहीं हुए, अपितु अपने आदि तत्व में विश्राम को प्राप्त हुए।


मिलन और विरह से परे, तत्वों का शाश्वत एकत्व::अयोध्या की सरयू और मिथिला की धरती — दोनों ही रामकथा के मूक किन्तु सर्वाधिक सशक्त पात्र हैं। सीता धरती से आईं और धरती में गईं; राम सरयू के तट पर जन्मे और सरयू में समाए। यह तात्विक सामंजस्य कथा को केवल एक प्रेम या विरह गाथा नहीं रहने देता, अपितु उसे सृष्टि के मूल तत्वों की एक गहन रूपक-कथा बना देता है। जहाँ सांसारिक दृष्टि से यह विछोह और शोक की कथा प्रतीत होती है, वहीं तात्विक दृष्टि से यह पूर्णता, संतुलन और सनातन चक्र की कथा है — जिसमें पृथ्वी और जल, सीता और राम, कभी वास्तव में पृथक नहीं होते, अपितु सृष्टि के उसी अनवरत प्रवाह में सदैव एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं, जो जनकपुर से लेकर जगद्गुरु भारत के भविष्य तक निरंतर प्रवाहमान है।



स्रोत _सन्दर्भ स्रोत: वाल्मीकि रामायण (बालकाण्ड, उत्तरकाण्ड); ऋग्वेद, क्षेत्रपति सूक्त; रामचरितमानस (गोस्वामी तुलसीदास); अद्भुत रामायण; आनंद रामायण; अध्यात्म रामायण। सभी उद्धृत श्लोक भावार्थ सहित प्रस्तुत किए गए हैं तथा विभिन्न परंपराओं को पृथक-पृथक चिह्नित रखा गया है।



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