वन्देमातरम श्रृंखला 93
वंदे मातरम् और भारत की स्मृतिहीन पीढ़ी
राष्ट्र की आत्मा से कटती युवा चेतना का प्रश्न
भारत केवल एक भूभाग नहीं है। यह केवल नदियों, पर्वतों और सीमाओं का मानचित्र भी नहीं है। भारत एक जीवित चेतना है — हजारों वर्षों की तपस्या, बलिदान, ज्ञान, संघर्ष और सांस्कृतिक स्मृतियों का अखंड प्रवाह। जिस राष्ट्र की स्मृति जीवित रहती है, वही राष्ट्र इतिहास बनाता है; और जिसकी स्मृति मर जाती है, वह केवल जनसंख्या बनकर रह जाता है।आज भारत के सामने सबसे बड़ा संकट आर्थिक नहीं, राजनीतिक नहीं, बल्कि “स्मृतिहीनता” का संकट है। यह वह स्थिति है जब नई पीढ़ी को अपने इतिहास का गर्व नहीं, अपने महापुरुषों का ज्ञान नहीं, अपने राष्ट्रगीत का अर्थ नहीं और अपने बलिदानों की पीड़ा का अनुभव नहीं होता।ऐसे समय में “वंदे मातरम्” केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय स्मृति का अंतिम दीपक बनकर खड़ा दिखाई देता है।
वंदे मातरम् : शब्द नहीं, राष्ट्रीय चेतना का महामंत्र#जब बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने “वंदे मातरम्” लिखा, तब उन्होंने कोई राजनीतिक नारा नहीं गढ़ा था। उन्होंने उस भारतमाता को स्वर दिया था, जो सदियों की गुलामी के बीच भी अपने पुत्रों को पुकार रही थी।“सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्…”इन शब्दों में केवल प्रकृति का वर्णन नहीं है; यह उस राष्ट्र की आत्मा का चित्रण है, जिसे विदेशी शासन ने तो जकड़ लिया था, पर उसकी चेतना को समाप्त नहीं कर पाया था। वंदे मातरम् सुनते ही क्रांतिकारियों की नसों में बिजली दौड़ जाती थी। फांसी के तख्ते पर चढ़ते हुए युवा इसे गाते थे। अंग्रेजों की गोलियों के सामने सीना तानकर खड़े होने वाले सेनानी इसी उद्घोष से प्रेरित होते थे।क्यों?क्योंकि “वंदे मातरम्” व्यक्ति को स्वयं से ऊपर उठाकर राष्ट्र के साथ जोड़ देता है। यह बताता है कि मातृभूमि केवल जमीन नहीं — वह माता है, और माता के लिए बलिदान अपमान नहीं, गौरव होता है।आज की पीढ़ी : सूचना सम्पन्न, स्मृति विहीन#आज का युवा मोबाइल में विश्व का ज्ञान रखता है, पर अपने राष्ट्र की आत्मा से अनभिज्ञ है। उसे विदेशी कलाकारों के नाम याद हैं, लेकिन खुदीराम बोस कौन थे — यह नहीं पता। उसे वेब सीरीज़ के पात्रों की कहानी याद है, लेकिन भगत सिंह की जेल डायरी का एक वाक्य भी ज्ञात नहीं।यह केवल भूल नहीं है; यह योजनाबद्ध सांस्कृतिक विच्छेदन का परिणाम है।
जिस पीढ़ी को उसके इतिहास से काट दिया जाए, वह उपभोक्ता तो बन सकती है, राष्ट्रनिर्माता नहीं। जिस युवा को केवल करियर सिखाया जाए, चरित्र नहीं — वह सफल कर्मचारी तो बन सकता है, पर सभ्यता का रक्षक नहीं।आज विद्यालयों में तकनीकी शिक्षा बढ़ी है, पर राष्ट्रीय चेतना सिकुड़ती जा रही है।हमारे बच्चे अंग्रेज़ी उच्चारण पर गर्व करते हैं, लेकिन “वंदे मातरम्” बोलते समय संकोच करते हैं।यह स्थिति केवल भाषा का प्रश्न नहीं; यह मानसिक दासता का संकेत है।
स्मृतिहीन समाज सबसे आसान शिकार होता है#इतिहास गवाह है कि किसी भी राष्ट्र को पराजित करने से पहले उसकी स्मृति पर आक्रमण किया जाता है।भारत में भी यही हुआ।विदेशी आक्रांताओं ने केवल मंदिर नहीं तोड़े; उन्होंने हमारी स्मृतियों को तोड़ा।औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली ने भारतीयों को यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया कि उनका अतीत अंधकारमय था और सभ्यता पश्चिम से आई।परिणाम यह हुआ कि भारतीय युवा अपने ही राष्ट्र को संदेह की दृष्टि से देखने लगा। उसे अपने ऋषि मिथक लगने लगे और विदेशी विचार अंतिम सत्य।
आज सोशल मीडिया ने इस संकट को और गहरा कर दिया है।“ट्रेंड” अब सत्य से बड़ा हो गया है।“वायरल” अब विचार से अधिक प्रभावशाली है।जो पीढ़ी प्रतिदिन 15 सेकंड के वीडियो में मनोरंजन खोजती हो, वह हजार वर्षों के संघर्ष की गंभीरता कैसे समझेगी?
वंदे मातरम् से डर क्यों? प्रश्न यह है कि आखिर “वंदे मातरम्” से भय किसे है? एक गीत, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन को ऊर्जा दी, वह विवाद का विषय क्यों बनाया जाता है?कारण स्पष्ट है — क्योंकि यह गीत भारतीयता को जगाता है। यह व्यक्ति को जाति, भाषा, प्रांत और राजनीति से ऊपर उठाकर राष्ट्र के साथ जोड़ देता है। Xवंदे मातरम् सुनते ही व्यक्ति को स्मरण होता है कि वह किसी उपभोक्ता बाजार का हिस्सा नहीं, बल्कि एक प्राचीन सभ्यता का उत्तराधिकारी है।और जिस दिन युवा को यह स्मरण हो गया, उसी दिन वह मानसिक गुलामी की जंजीरों को तोड़ देगा।इसलिए स्मृतिहीनता को बढ़ावा देने वाली शक्तियाँ चाहती हैं कि युवा केवल मनोरंजन में डूबा रहे, इतिहास से दूर रहे, और राष्ट्र को केवल सुविधाओं का केंद्र समझे।
राष्ट्र केवल संविधान से नहीं, स्मृतियों से बनता है#संविधान राष्ट्र को व्यवस्था देता है, लेकिन राष्ट्र की आत्मा उसकी सांस्कृतिक स्मृतियाँ होती हैं।यदि किसी देश के नागरिकों को अपने महापुरुषों, स्वतंत्रता संग्राम, साहित्य, गीत, तीर्थ और परंपराओं का ज्ञान ही न हो, तो वह राष्ट्र धीरे-धीरे केवल आर्थिक इकाई बन जाता है। भारत की शक्ति उसकी विविधता में नहीं, बल्कि उस विविधता को जोड़ने वाली स्मृति में है।काशी से कन्याकुमारी तक, द्वारका से कामाख्या तक, भारत को जोड़ने वाला सूत्र क्या है?वह है — सांस्कृतिक चेतना।और “वंदे मातरम्” उसी चेतना का राष्ट्रीय स्वर है।
नई पीढ़ी को क्या देना होगा? यदि भारत को शक्तिशाली बनाना है, तो केवल स्टार्टअप और तकनीक पर्याप्त नहीं होंगे।हमें अपनी युवा पीढ़ी को तीन चीजें देनी होंगी:
1. इतिहास का सत्य#उन्हें यह बताना होगा कि भारत केवल गुलामी की कहानी नहीं है।यह विश्वगुरु, विज्ञान, दर्शन, साहित्य और बलिदान की भी भूमि है।
2. राष्ट्र का भाव#युवा को यह समझाना होगा कि राष्ट्रवाद घृणा नहीं, कर्तव्य है।वंदे मातरम् कहना किसी के विरुद्ध नहीं, भारत के पक्ष में खड़ा होना है।
3. स्मृति का संस्कार#परिवारों और विद्यालयों में राष्ट्रगीत, स्वतंत्रता सेनानियों की गाथाएँ, भारतीय साहित्य और सांस्कृतिक परंपराओं का पुनर्जागरण आवश्यक है।
आधुनिकता बनाम राष्ट्रीय चेतना नहीं कुछ लोग यह भ्रम फैलाते हैं कि राष्ट्रवाद आधुनिकता के विरुद्ध है।जबकि सत्य इसके विपरीत है।जापान आधुनिक भी है और अपनी संस्कृति से जुड़ा भी।इज़राइल तकनीकी शक्ति भी है और अपनी ऐतिहासिक स्मृति के प्रति सजग भी।समस्या आधुनिकता नहीं; समस्या अपनी जड़ों से कट जाना है।पेड़ जितना ऊँचा उठता है, उसकी जड़ें उतनी गहरी होनी चाहिए।भारत की नई पीढ़ी को विश्वस्तरीय बनना चाहिए, पर अपनी सभ्यता से विमुख होकर नहीं।
स्मृति लौटेगी तो राष्ट्र जागेगा#जिस दिन भारत का युवा पुनः अपने इतिहास को पढ़ेगा, अपने राष्ट्रगीत को समझेगा, अपने महापुरुषों को जानेगा — उसी दिन भारत केवल आर्थिक शक्ति नहीं, सभ्यतागत शक्ति बन जाएगा।वंदे मातरम् तब केवल कार्यक्रमों में गाया जाने वाला गीत नहीं रहेगा; वह राष्ट्रीय पुनर्जागरण का उद्घोष बन जाएगा।यह गीत हमें याद दिलाता है कि हम किसी दुर्घटना से बने राष्ट्र नहीं हैं।हम उस सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं जिसने संसार को ज्ञान, योग, दर्शन, करुणा और सहअस्तित्व का संदेश दिया।यदि यह स्मृति जीवित रही, तो भारत अजेय रहेगा।यदि यह स्मृति मर गई, तो विकास के बावजूद आत्मा खो जाएगी।
आज आवश्यकता केवल यह नहीं कि “वंदे मातरम्” बोला जाए; आवश्यकता यह है कि उसे जिया जाए।जब युवा अपने राष्ट्र को माता मानने लगेगा, तब भ्रष्टाचार कम होगा, कर्तव्यबोध बढ़ेगा, और समाज में आत्मीयता लौटेगी।जो राष्ट्र अपनी मातृभूमि को पूज्य मानता है, वह कभी स्थायी रूप से पराजित नहीं हो सकता।भारत की सबसे बड़ी लड़ाई सीमाओं पर नहीं, स्मृतियों के भीतर चल रही है।एक ओर वह शक्ति है जो भारत को केवल बाजार बनाना चाहती है; दूसरी ओर वह चेतना है जो भारत को पुनः सभ्यता-राष्ट्र के रूप में जगाना चाहती है।इस संघर्ष में “वंदे मातरम्” केवल गीत नहीं — राष्ट्रीय आत्मा का शंखनाद है।और जब तक यह शंखनाद गूंजता रहेगा, तब तक भारत की स्मृति भी जीवित रहेगी, और भारत भी।
वंदे मातरम्।
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