नेपाल से प्रेरणा, भारत के लिए अवसर या
चौमूखी राजनितिक दबाव
सम्पादकीय,राजेंद्र नाथ तिवारी
दक्षिण एशिया की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प हलचल है। हमारे पड़ोसी देश नेपाल में उभरती नीतिगत बहसें और कुछ साहसिक प्रस्ताव यह संकेत दे रहे हैं कि व्यवस्था में बदलाव केवल बड़े संसाधनों से नहीं, बल्कि बड़े इरादों से आता है। बालेन शाह जैसे युवा नेतृत्व के प्रयोगों ने इस चर्चा को और धार दी है। प्रश्न यह है कि क्या यह “पड़ोसी मॉडल” भारत के लिए भी कोई सीख समेटे हुए है, या यह केवल एक आकर्षक कल्पना भर है?
शिक्षा: समानता की पहली शर्त,,नेपाल में यह विचार कि जनप्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में शिक्षा मिले, सुनने में जितना सरल है, उतना ही क्रांतिकारी भी। यह प्रस्ताव सीधे-सीधे उस खाई पर चोट करता है जो नीति-निर्माताओं और आम नागरिक के बीच बन चुकी है।भारत में शिक्षा का ढांचा व्यापक है, लेकिन समानता का प्रश्न आज भी अनुत्तरित है। निजी स्कूलों के बढ़ते प्रभाव और सरकारी स्कूलों की गिरती साख ने एक “दोहरी व्यवस्था” को जन्म दिया है। यदि नीति-निर्माता स्वयं सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता से जुड़े हों, तो सुधार केवल योजना नहीं, बल्कि व्यक्तिगत जिम्मेदारी बन सकता है। किंतु यह भी सच है कि केवल एक नियम से पूरी व्यवस्था नहीं बदलती—इसके लिए संसाधन, प्रशिक्षण और जवाबदेही का संगम आवश्यक है।
व्यक्तिपूजा बनाम संस्थागत विश्वास,,नेपाल में सरकारी दफ्तरों से नेताओं की तस्वीरें हटाने की चर्चा केवल प्रतीकात्मक नहीं है; यह शासन के चरित्र को बदलने का संकेत है। यह बताता है कि लोकतंत्र में व्यक्ति नहीं, बल्कि संस्थाएं सर्वोपरि होनी चाहिए।भारत में लोकतंत्र मजबूत है, परंतु व्यक्तिपूजा की प्रवृत्ति समय-समय पर संस्थाओं पर भारी पड़ती दिखती है। सरकारी योजनाओं का प्रचार यदि व्यक्ति-केन्द्रित हो जाए, तो वह लोकतांत्रिक भावना को सीमित कर देता है। चुनौती यह है कि भारत अपने संस्थागत ढांचे को और अधिक स्वतंत्र, पारदर्शी और व्यक्ति-निरपेक्ष बनाए।
वीआईपी संस्कृति: लोकतंत्र की विडंबना,,सड़क पर सायरन बजाती गाड़ियों और आम नागरिक की ठहरी हुई जिंदगी—यह दृश्य किसी भी लोकतंत्र के लिए असहज प्रश्न खड़ा करता है। नेपाल में वीआईपी मूवमेंट को सीमित करने की सोच यह दर्शाती है कि शासन का उद्देश्य सुविधा नहीं, सेवा होना चाहिए।भारत में भी इस दिशा में न्यायालयों और सरकारों द्वारा समय-समय पर प्रयास किए गए हैं, परंतु व्यवहार में यह संस्कृति अभी भी जीवित है। असली बदलाव तब होगा जब सत्ता स्वयं विशेषाधिकार छोड़ने का साहस दिखाएगी।
राजनीति: विभाजन से विमर्श की ओर,,नेपाल का झुकाव एक अधिक समावेशी और समानता-आधारित समाज की ओर है। भारत का संविधान पहले ही इस दिशा में एक मजबूत आधार प्रदान करता है, लेकिन व्यवहारिक राजनीति अक्सर इन आदर्शों से भटक जाती है।चुनावों में जाति, धर्म और क्षेत्रीय समीकरणों का प्रभाव यह दर्शाता है कि लोकतंत्र केवल संस्थागत ढांचे से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना से भी संचालित होता है। जब तक मतदाता स्वयं इन मुद्दों से ऊपर उठकर निर्णय नहीं करेगा, तब तक राजनीतिक विमर्श सीमित ही रहेगा।
क्या भारत केवल सपना देख रहा है?यह कहना सरल है कि भारत पीछे रह गया है, लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है। भारत एक जटिल और विशाल लोकतंत्र है, जहां परिवर्तन की गति स्वाभाविक रूप से धीमी होती है। फिर भी, यह भी उतना ही सत्य है कि जवाबदेही की कमी और व्यवस्था में व्याप्त असंतुलन कई बार सुधार की गति को रोक देते हैं।
“नेताओं के बच्चों के लिए सरकारी स्कूल अनिवार्य” जैसी नीतियां निश्चित रूप से एक बड़ा प्रतीकात्मक बदलाव ला सकती हैं, लेकिन इसे 90% समस्याओं का समाधान मानना अतिशयोक्ति होगी। यह एक शुरुआत हो सकती है—एक ऐसी शुरुआत, जो व्यवस्था को भीतर से झकझोर दे।: बदलाव का वास्तविक सूत्र,,नेपाल का उदाहरण भारत के लिए एक चुनौती नहीं, बल्कि एक प्रेरणा हो सकता है। यह याद दिलाता है कि—सुधार केवल सत्ता परिवर्तन से नहीं, बल्कि सोच और संरचना के परिवर्तन से आते हैं।
भारत के पास संसाधन हैं, संस्थाएं हैं, और सबसे महत्वपूर्ण—एक जागरूक समाज है। आवश्यकता है तो केवल इस बात की कि शासन और जनता, दोनों अपनी-अपनी जिम्मेदारी को समझें और निभाएं।पड़ोसी का आईना हमें अपनी कमियां दिखा सकता है, लेकिन उसे सुधारना हमारे ही हाथ में है।

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