** अथ राहुल गांधी का जर्मनी प्रस्थान :
नेतृत्व से पलायन या कांग्रेस की स्थायी राजनीतिक आदत?**
लोकसभा सत्र समाप्त होने से पहले ही राहुल गांधी का जर्मनी रवाना हो जाना केवल एक व्यक्तिगत यात्रा नहीं है, यह कांग्रेस के नेतृत्व-संकट का सार्वजनिक प्रमाण है। जब संसद में सरकार से सवाल पूछे जाने चाहिए थे, जब विपक्ष को वैकल्पिक दृष्टि रखनी चाहिए थी, तब कथित विपक्षी नेता का देश छोड़ देना लोकतांत्रिक राजनीति में एक गंभीर और नकारात्मक संदेश देता है।यह कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही एक राजनीतिक प्रवृत्ति है—संकट आया नहीं कि राहुल गांधी विदेश में।
नेतृत्व का अर्थ : उपस्थिति, न कि उपनाम-लोकतंत्र में नेतृत्व वंश से नहीं, उपस्थिति और संघर्ष से प्रमाणित होता है। कांग्रेस आज जिस स्थिति में है, वहाँ उसे किसी “छुट्टी पर रहने वाले नेता” की नहीं, बल्कि चौबीसों घंटे मैदान में डटे नेतृत्व की आवश्यकता है।राहुल गांधी बार-बार यह दावा करते हैं कि वे वैचारिक राजनीति करते हैं, लेकिन प्रश्न यह है—क्या संसद से अनुपस्थित रहकर वैचारिक लड़ाई लड़ी जाती है?क्या पार्टी को अनिर्णय में छोड़कर प्रधानमंत्री पद का स्वप्न देखा जा सकता है?
कांग्रेस के भीतर टूट और बाहर भ्रम-राहुल गांधी की अनुपस्थिति ने पार्टी के भीतर दो स्पष्ट धड़े बना दिए हैएक वह, जो परिवार के नाम पर नेतृत्व ढो रहा है दूसरा वह, जो नेतृत्वहीनता से त्रस्त है लेकिन बोलने का साहस नहीं जुटा पा रहा
इनके बीच “चकित-चम्पक प्रवृत्ति” के कांग्रेसी केवल बयानबाज़ी में लगे हैं—सामूहिक प्रस्ताव, खोखली घोषणाएँ और यह भरोसा दिलाने का प्रयास कि “इस बार दिल्ली दूर नहीं”।लेकिन सच्चाई यह है कि दिल्ली आज कांग्रेस से उतनी ही दूर है, जितना राहुल गांधी संसद से।
विदेश यात्राएँ और राजनीतिक गैर-गंभीरता#कोई भी राष्ट्रीय नेता विदेश जा सकता है—पर सवाल कब और किस समय का है।जब संसद चल रही हो, जब सरकार कठघरे में खड़ी हो, जब विपक्ष को धारदार भूमिका निभानी हो—उस समय विदेश जाना जिम्मेदारी से बचने जैसा प्रतीत होता है, चाहे उसे कितना भी अकादमिक आवरण क्यों न दिया जाए।यही कारण है कि अब यह सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या राहुल गांधी दबाव में राजनीति से “ब्रेक” लेते हैं?या उन्हें सत्ता की लड़ाई में टिके रहने की मानसिक तैयारी ही नहीं है?“भागना” शब्द क्यों चर्चा में है?राजनीति में धारणा ही सबसे बड़ा सच होती है।जो नेता बार-बार कठिन समय में अनुपस्थित रहता है, जनता उसे यही कहेगी—वह मैदान छोड़ गया।
राहुल गांधी ने स्वयं अपने आचरण से यह धारणा बनाई है। इसलिए “जर्मनी भाग गए” जैसा वाक्य व्यंग्य नहीं, बल्कि राजनीतिक आकलन बनता जा रहा है।
कांग्रेस का असली संकट-कांग्रेस का संकट सरकार नहीं, भाजपा नहीं—कांग्रेस का संकट उसका नेतृत्व है।जब तक पार्टी यह तय नहीं करती कि उसे नाम चाहिए या नेतृत्व, तब तक न जर्मनी से लौटने वाले दौरे उसे बचा पाएँगे, न सामूहिक प्रस्ताव।लोकतंत्र में सत्ता उन्हीं को मिलती है जोदेश में रहते हैंसंसद में लड़ते हैंऔर कठिन समय में भागते नहीं,बाकी इतिहास केवल पलायन को नोट करता है, नेतृत्व को नहीं।

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