संत कटघरे में, यूजीसी मौन और व्यवस्था निश्चिंत
अभिमुक्तेश्वरानंद, अलंकार अग्निहोत्री और आज की वैचारिक राजनीति
अभिमुक्तेश्वरानंद, अलंकार अग्निहोत्री और आज की वैचारिक राजनीति
भारत में सत्ता को सबसे अधिक असहज यदि कोई करता है, तो वह विपक्ष नहीं—
संत, समाज और सवाल करते हैं। अभिमुक्तेश्वरानंद का प्रकरण इसका ताज़ा उदाहरण है। एक ओर शंकराचार्य परंपरा से जुड़ा संत, जो शिक्षा, समाज और यूजीसी जैसी संस्थाओं पर प्रश्न उठाता है; दूसरी ओर राज्य–प्रशासन, जो हर असुविधाजनक प्रश्न को “कानून–व्यवस्था” के फ्रेम में बंद कर देना चाहता है। और तीसरी ओर यूजीसी—जो इस पूरे विवाद में न तो पक्ष है, न प्रतिपक्ष, बल्कि एक मौन दर्शक बनकर खड़ी है। यह त्रिकोण केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की वैचारिक सेहत का परीक्षण है। संत की वाणी से सत्ता क्यों डरती है?इतिहास गवाह है—भारत में संत कभी सत्ता के सजावटी पात्र नहीं रहे। वे प्रश्न करते हैं, ललकारते हैं, और अक्सर असहज भाषा में सत्य रखते हैं। कबीर हों या गुरु नानक, शंकराचार्य हों या विवेकानंद—संतों ने हमेशा व्यवस्था को आईना दिखाया है, प्रशस्ति–पत्र नहीं दिया।
अभिमुक्तेश्वरानंद की भाषा से असहमति हो सकती है, लेकिन यह मान लेना कि संत की भूमिका केवल आध्यात्मिक प्रवचन तक सीमित होनी चाहिए—भारतीय परंपरा की घोर अज्ञानता है। भारत में संत सामाजिक हस्तक्षेप करते हैं, क्योंकि समाज ही उनकी साधना का क्षेत्र रहा है। अलंकार अग्निहोत्री का निर्णय: कानून की जीत या विवेक की हार? प्रशासनिक दृष्टि से अलंकार अग्निहोत्री का निर्णय “नियमसम्मत” कहा जा सकता है। राज्य का दायित्व है कि वह सार्वजनिक शांति बनाए रखे। लेकिन यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है—क्या हर कानूनी निर्णय सामाजिक रूप से भी न्यायपूर्ण होता है? यदि किसी निर्णय में—सामाजिक पृष्ठभूमि की उपेक्षा हो
संत–परंपरा को उकसावे की श्रेणी में डाल दिया जाए और विमर्श को दमन से नियंत्रित करने की कोशिश हो तो वह निर्णय कानून की किताब में भले सही लगे, समाज की अदालत में संदिग्ध हो जाता है।
भारत में प्रशासनिक तंत्र बार–बार यही भूल करता रहा है—वह संवाद की जगह आदेश को चुनता है। यूजीसी: समस्या की जड़, समाधान से गायब
इस पूरे विवाद में सबसे चिंताजनक भूमिका यूजीसी की है—या कहें, भूमिका का अभाव। यूजीसी वह संस्था है, जिसके निर्णयों ने—छात्रों को सड़कों पर उतारा,शिक्षकों को असुरक्षा में डाला और शिक्षा को रोजगार–विरोधी प्रयोगशाला बना दिया,लेकिन जब इन्हीं नीतियों पर सामाजिक या वैचारिक सवाल उठते हैं, यूजीसी चुप्पी साध लेती है। न संवाद, न आत्मालोचना, न स्पष्टीकरण—केवल अधिसूचना और आदेश।
यह मौन ही यूजीसी का सबसे बड़ा अपराध है। क्या असहमति अब अपराध है?
आज का भारत एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ—असहमति को अव्यवस्था
प्रश्न को विद्रोह और आलोचना को देशद्रोह के समान देखा जाने लगा है।
यदि एक संत यूजीसी की नीतियों पर सवाल उठाता है और प्रशासन तुरंत दंडात्मक मुद्रा में आ जाता है, तो यह संकेत स्पष्ट है—राज्य बहस नहीं, नियंत्रण चाहता है।
लेकिन इतिहास सिखाता है कि नियंत्रण से शांति नहीं,और दमन से स्थिरता नहींआती।आक्रामक भाषा बनाम आक्रामक यथार्थ अक्सर तर्क दिया जाता है कि संत की भाषा “आक्रामक” है। प्रश्न यह है—क्या बेरोज़गारी, शैक्षिक अनिश्चितता और संस्थागत अन्याय आक्रामक नहीं हैं?
जब यथार्थ आक्रामक हो जाए, तो भाषा भी तीखी होती है। यह नैतिक नियम है।
भारत आदेश से नहीं, संवाद से चलेगा अभिमुक्तेश्वरानंद से सहमत होना अनिवार्य नहीं, लेकिन उन्हें सुने बिना दंडित करना खतरनाक परंपरा है। अलंकार अग्निहोत्री का निर्णय कानून की कसौटी पर खरा हो सकता है,पर लोकतांत्रिक विवेक की कसौटी पर उसकी समीक्षा आवश्यक है। और यूजीसी—यदि वह स्वयं को केवल नियामक संस्था मानकर चुप रहेगी,तो इतिहास उसे शिक्षा–संकट का मौन साझेदार मानेगा।
भारत को आज आदेश नहीं,संवाद चाहिए।लाठी नहीं, तर्क चाहिए।और मौन नहीं, उत्तर चाहिए।
संत, समाज और सवाल करते हैं। अभिमुक्तेश्वरानंद का प्रकरण इसका ताज़ा उदाहरण है। एक ओर शंकराचार्य परंपरा से जुड़ा संत, जो शिक्षा, समाज और यूजीसी जैसी संस्थाओं पर प्रश्न उठाता है; दूसरी ओर राज्य–प्रशासन, जो हर असुविधाजनक प्रश्न को “कानून–व्यवस्था” के फ्रेम में बंद कर देना चाहता है। और तीसरी ओर यूजीसी—जो इस पूरे विवाद में न तो पक्ष है, न प्रतिपक्ष, बल्कि एक मौन दर्शक बनकर खड़ी है। यह त्रिकोण केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की वैचारिक सेहत का परीक्षण है। संत की वाणी से सत्ता क्यों डरती है?इतिहास गवाह है—भारत में संत कभी सत्ता के सजावटी पात्र नहीं रहे। वे प्रश्न करते हैं, ललकारते हैं, और अक्सर असहज भाषा में सत्य रखते हैं। कबीर हों या गुरु नानक, शंकराचार्य हों या विवेकानंद—संतों ने हमेशा व्यवस्था को आईना दिखाया है, प्रशस्ति–पत्र नहीं दिया।
अभिमुक्तेश्वरानंद की भाषा से असहमति हो सकती है, लेकिन यह मान लेना कि संत की भूमिका केवल आध्यात्मिक प्रवचन तक सीमित होनी चाहिए—भारतीय परंपरा की घोर अज्ञानता है। भारत में संत सामाजिक हस्तक्षेप करते हैं, क्योंकि समाज ही उनकी साधना का क्षेत्र रहा है। अलंकार अग्निहोत्री का निर्णय: कानून की जीत या विवेक की हार? प्रशासनिक दृष्टि से अलंकार अग्निहोत्री का निर्णय “नियमसम्मत” कहा जा सकता है। राज्य का दायित्व है कि वह सार्वजनिक शांति बनाए रखे। लेकिन यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है—क्या हर कानूनी निर्णय सामाजिक रूप से भी न्यायपूर्ण होता है? यदि किसी निर्णय में—सामाजिक पृष्ठभूमि की उपेक्षा हो
संत–परंपरा को उकसावे की श्रेणी में डाल दिया जाए और विमर्श को दमन से नियंत्रित करने की कोशिश हो तो वह निर्णय कानून की किताब में भले सही लगे, समाज की अदालत में संदिग्ध हो जाता है।
भारत में प्रशासनिक तंत्र बार–बार यही भूल करता रहा है—वह संवाद की जगह आदेश को चुनता है। यूजीसी: समस्या की जड़, समाधान से गायब
इस पूरे विवाद में सबसे चिंताजनक भूमिका यूजीसी की है—या कहें, भूमिका का अभाव। यूजीसी वह संस्था है, जिसके निर्णयों ने—छात्रों को सड़कों पर उतारा,शिक्षकों को असुरक्षा में डाला और शिक्षा को रोजगार–विरोधी प्रयोगशाला बना दिया,लेकिन जब इन्हीं नीतियों पर सामाजिक या वैचारिक सवाल उठते हैं, यूजीसी चुप्पी साध लेती है। न संवाद, न आत्मालोचना, न स्पष्टीकरण—केवल अधिसूचना और आदेश।
यह मौन ही यूजीसी का सबसे बड़ा अपराध है। क्या असहमति अब अपराध है?
आज का भारत एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ—असहमति को अव्यवस्था
प्रश्न को विद्रोह और आलोचना को देशद्रोह के समान देखा जाने लगा है।
यदि एक संत यूजीसी की नीतियों पर सवाल उठाता है और प्रशासन तुरंत दंडात्मक मुद्रा में आ जाता है, तो यह संकेत स्पष्ट है—राज्य बहस नहीं, नियंत्रण चाहता है।
लेकिन इतिहास सिखाता है कि नियंत्रण से शांति नहीं,और दमन से स्थिरता नहींआती।आक्रामक भाषा बनाम आक्रामक यथार्थ अक्सर तर्क दिया जाता है कि संत की भाषा “आक्रामक” है। प्रश्न यह है—क्या बेरोज़गारी, शैक्षिक अनिश्चितता और संस्थागत अन्याय आक्रामक नहीं हैं?
जब यथार्थ आक्रामक हो जाए, तो भाषा भी तीखी होती है। यह नैतिक नियम है।
भारत आदेश से नहीं, संवाद से चलेगा अभिमुक्तेश्वरानंद से सहमत होना अनिवार्य नहीं, लेकिन उन्हें सुने बिना दंडित करना खतरनाक परंपरा है। अलंकार अग्निहोत्री का निर्णय कानून की कसौटी पर खरा हो सकता है,पर लोकतांत्रिक विवेक की कसौटी पर उसकी समीक्षा आवश्यक है। और यूजीसी—यदि वह स्वयं को केवल नियामक संस्था मानकर चुप रहेगी,तो इतिहास उसे शिक्षा–संकट का मौन साझेदार मानेगा।
भारत को आज आदेश नहीं,संवाद चाहिए।लाठी नहीं, तर्क चाहिए।और मौन नहीं, उत्तर चाहिए।

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