वन्देमातरम 79 श्रृंखला
वन्देमातरम् और भाषा की राजनीति
वन्देमातरम्—दो शब्द, पर अर्थ अनंत। यह केवल एक गीत, एक नारा या एक ऐतिहासिक स्मृति नहीं है; यह भारत की आत्मा की ध्वनि है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस वन्देमातरम् ने भारत की विविध भाषाओं, संस्कृतियों और अस्मिताओं को एक सूत्र में बांधने का कार्य किया, वही वन्देमातरम् समय-समय पर भाषा की राजनीति का केंद्र बना दिया गया। प्रश्न यह नहीं है कि वन्देमातरम् क्या है, प्रश्न यह है कि हम उसे कैसे देखते हैं—संवेदना से या संदेह से, समरसता से या संकीर्ण राजनीति से।
भारत में भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं रही, वह सत्ता, पहचान और राजनीति का औजार भी रही है। वन्देमातरम् इसी भाषा-राजनीति के चौराहे पर खड़ा एक ऐसा प्रतीक है, जिसे कभी राष्ट्रभक्ति का सर्वोच्च स्वर माना गया, तो कभी भाषाई, धार्मिक और वैचारिक टकराव का बहाना बना दिया गया।
वन्देमातरम् का ऐतिहासिक और भाषिक संदर्भ:वन्देमातरम् की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में की। यह गीत संस्कृतनिष्ठ बांग्ला में लिखा गया—एक ऐसी भाषा-शैली जो उस समय की बौद्धिक और सांस्कृतिक चेतना की प्रतिनिधि थी। यह भाषा न तो शुद्ध संस्कृत थी और न ही सामान्य बोलचाल की बांग्ला; यह एक सेतु थी—प्राचीनता और आधुनिकता के बीच।
यही सेतु आगे चलकर राजनीति का अखाड़ा बन गया। कुछ ने कहा—यह संस्कृतनिष्ठ है, इसलिए यह सबकी नहीं हो सकती। कुछ ने कहा—यह बांग्ला में है, इसलिए यह क्षेत्रीय है। और कुछ ने इसे धार्मिक प्रतीक कहकर खारिज करने का प्रयास किया। लेकिन इतिहास गवाह है कि वन्देमातरम् का उदय किसी एक भाषा, जाति या धर्म की सीमाओं में नहीं हुआ था। यह ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध एक साझा प्रतिरोध की भाषा था।लाला लाजपत राय, विपिन चंद्र पाल, अरविंद घोष, महात्मा गांधी—सबने अपने-अपने ढंग से वन्देमातरम् को स्वीकार किया। गांधीजी ने स्पष्ट कहा कि वन्देमातरम् राष्ट्रप्रेम का पवित्र गीत है, लेकिन किसी पर इसे थोपना नहीं चाहिए। यह कथन स्वयं में भाषा-राजनीति के प्रति उनकी सूक्ष्म समझ को दर्शाता है।
भाषा : संवाद से सत्ता तक:भारत में भाषा का प्रश्न कभी सरल नहीं रहा। औपनिवेशिक काल में अंग्रेज़ी सत्ता की भाषा बनी, तो स्वतंत्रता के बाद हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बहस शुरू हुई। इसी बहस के भीतर वन्देमातरम् को भी घसीट लिया गया।कुछ वर्गों ने वन्देमातरम् को ‘हिंदी-संस्कृत वर्चस्व’ के प्रतीक के रूप में चित्रित किया, जबकि वास्तविकता यह थी कि यह न तो शुद्ध हिंदी में था और न ही वन्देमातरम और भाषा की राजनीतिवन्दे मातरम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक प्रेरक राष्ट्रगीत है, जिसकी रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी।यह गीत न केवल सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है, बल्कि भाषा और राष्ट्रवाद की जटिल राजनीति का केंद्र बिंदु भी रहा है, खासकर हिंदी बनाम अन्य भारतीय भाषाओं के संदर्भ में।गीत की उत्पत्ति और भाषाई संरचनाबंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवंबर 1875 को 'आनंदमठ' उपन्यास में वन्दे मातरम की रचना की, जो मूल रूप से बांग्ला भाषा में लिखा गया था, लेकिन संस्कृत शब्दावली से युक्त। पहले दो पद शुद्ध संस्कृत में हैं, जबकि बाद के पद बांग्ला प्रभावित हैं, जो भारत माता को दुर्गा के रूप में चित्रित करते हैं। हिंदी अनुवाद में इसे देवनागरी लिपि में ढाला गया, लेकिन 'वन्दे' की ध्वनि बांग्ला के 'बन्दे' से भिन्न है।
यह मिश्रित भाषा स्वतंत्रता आंदोलन में राष्ट्रवादी उत्साह जगाने का माध्यम बनी। बंकिम ने इसे साहित्यिक रूप से रचा, लेकिन राजनीतिक संदर्भ ने इसे अमर कर दिया। उत्तर प्रदेश जैसे हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी संस्करण प्रमुख हो गया।स्वतंत्रता संग्राम में प्रतीकात्मक भूमिका1905 के बंगाल विभाजन के विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे कलकत्ता टाउन हॉल में पहली बार सार्वजनिक गाया, जो स्वदेशी आंदोलन का नारा बन गया। ब्रिटिश शासन ने 1909 में इसे सेडिशन एक्ट के तहत प्रतिबंधित किया। 1896 के कांग्रेस अधिवेशनों से यह नियमित रूप से गाया जाने लगा।उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों ने इसे प्रेरणा स्रोत बनाया। बस्ती क्षेत्र में स्थानीय सांस्कृतिक आयोजनों में यह गीत राष्ट्रवाद का प्रतीक रहा। 1920 के असहयोग आंदोलन में गांधी ने इसे अपनाया, लेकिन बाद में विवाद उभरा।1937 का कांग्रेस फैसला: भाषा और धर्म का मिश्रणमुस्लिम लीग ने आपत्ति जताई कि गीत के बाद के पद हिंदू देवी की स्तुति हैं, जो इस्लामी एकेश्वरवाद के विरुद्ध हैं। 1937 के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में नेहरू-अबुल कलाम आजाद समिति ने केवल पहले दो पदों को स्वीकार किया, जो भाषाई रूप से तटस्थ माने गए। यह फैसला भाषा राजनीति का प्रारंभिक उदाहरण था, जहां बांग्ला मूल को हिंदी अनुवाद में समायोजित किया गया।उत्तर प्रदेश में यह फैसला विवादास्पद रहा, क्योंकि हिंदी राष्ट्रवादी इसे अपूर्ण मानते थे। कांग्रेस की इस नीति ने भाषाई एकता vs धार्मिक संवेदनशीलता की बहस को जन्म दिया।संविधान सभा बहस: राष्ट्रगीत का दर्जा1949-50 की संविधान सभा बहस में मौलाना आजाद, सरदार पटेल और नेल्सन ने वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत का दर्जा देने का समर्थन किया, लेकिन पूरा गीत नहीं। रवींद्रनाथ टैगोर ने भी पत्र लिखकर बाद के पद हटाने का सुझाव दिया। भाषा विवाद यहां उभरा, क्योंकि बांग्ला मूल को हिंदी में अनुवादित करने पर दक्षिण भारत ने हिंदी थोपने का आरोप लगाया।24 जनवरी 1950 को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने इसे राष्ट्रगीत घोषित किया। यह निर्णय भाषाई विविधता को मान्यता देते हुए लिया गया।उत्तर प्रदेश में भाषा राजनीति का स्थानीय संदर्भयोगी आदित्यनाथ सरकार ने 2025 में स्कूलों और सरकारी आयोजनों में वन्दे मातरम अनिवार्य किया, जो हिंदी राष्ट्रवाद को मजबूत करता है। बस्ती मंडल जैसे क्षेत्रों में कौटिल्य फाउंडेशन के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में यह प्रमुख है। हिंदी अनुवाद यहां स्वाभाविक रूप से प्रचलित है, लेकिन उर्दू-हिंदी बहस में यह मुद्दा उठता रहता है।उत्तर प्रदेश विधानसभा में 2025 में योगी ने इसे "राष्ट्र की चेतना" कहा। स्थानीय पत्रकारिता में यह विषय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जुड़ता है।दक्षिण भारत और हिंदी विरोधी आंदोलनतमिलनाडु में 1960-70 के हिंदी विरोधी आंदोलनों में वन्दे मातरम को हिंदी थोपने का प्रतीक माना गया। डीएमके ने इसे भाषाई आक्रामकता से जोड़ा। 2025 में अमित शाह की 'एक राष्ट्र एक भाषा' नीति पर बहस में यह फिर उभरा।
बांग्ला मूल को नजरअंदाज कर हिंदी संस्करण थोपने का आरोप लगा। यह संघीय ढांचे में भाषाई संघर्ष दर्शाता है।2025 संसदीय विवाद: समकालीन आयामदिसंबर 2025 में राज्यसभा में 10 घंटे की बहस हुई, जहां भाजपा ने कांग्रेस पर 'मुस्लिम तुष्टिकरण' का आरोप लगाया। पीएम मोदी समर्थकों ने 1937 फैसले को निशाना बनाया। विपक्ष ने धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला दिया।यह बहस भाषा नीति से जुड़ी, क्योंकि हिंदी को राष्ट्रीय भाषा बनाने की कोशिशें दक्षिणी राज्यों को नागवार गुजरीं।सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और भाषाई पहचानवन्दे मातरम ने बांग्ला-सस्कृत से हिंदी तक का सफर तय किया, जो भारतीय बहुभाषावाद को दर्शाता है। आरएसएस-भाजपा इसे हिंदुत्व से जोड़ते हैं, जबकि वामपंथी सांस्कृतिक विविधता पर जोर देते हैं। उत्तर प्रदेश में यह स्थानीय पत्रकारिता का विषय है।150 वर्षों में (1875-2025) यह गीत भाषा को राजनीतिक हथियार बनाता रहा।
वैश्विक और दार्शनिक संदर्भयूएन में भारतीय प्रतिनिधियों ने इसे गाया। दार्शनिक रूप से, यह मातृभाषा और राष्ट्रमाता के संयोग को दर्शाता। हिंदी अनुवाद ने उत्तर भारत में इसे लोकप्रिय बनाया।भविष्य की संभावनाएंभाषा नीति में NEP 2020 हिंदी को बढ़ावा दे रही, लेकिन संघीय विरोध रहेगा। बस्ती जैसे क्षेत्रों में सांस्कृतिक आयोजन इसे जीवंत रखेंगे।यह गीत भारत की भाषाई विविधता और एकता का प्रतीक है।
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