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गुरुवार, 25 जून 2026

25,जून 1975:देश जरा याद करो इंदिरा की शैतानी!




  राजेन्द्र  नाथ  तिवारी, बस्ती, 272001


आपातकाल: लोकतंत्र पर काली छाया,भारत का इतिहास केवल स्वतंत्रता-संग्राम का इतिहास नहीं है, वह उन संघर्षों का भी इतिहास है जिनमें स्वतंत्रता के बाद भी लोकतंत्र को बार-बार अपनी ही आग में तपना पड़ा। 25 जून 1975 की रात भारतीय गणतंत्र के इतिहास में एक ऐसा काला अध्याय लेकर आई, जिसे आज भी याद करते हुए मन सिहर उठता है। यह वह समय था जब संविधान के शब्द तो जीवित थे, पर उनकी आत्मा को जकड़ने के लिए सत्ता की बेड़ियाँ कस दी गई थीं। इसे “आपातकाल” कहा गया, पर यह केवल प्रशासनिक संकट नहीं था; यह लोकतंत्र के चेहरे पर पड़ा वह तमाचा था जिसकी गूंज आज भी सुनाई देती है।आपातकाल की घोषणा अचानक नहीं हुई थी। उसके पीछे राजनीतिक तनाव, न्यायालय के फैसले, सत्ता की असुरक्षा और विरोध की तीव्र लहर थी। देश में महँगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और असंतोष का वातावरण पहले से मौजूद था। जनता का आक्रोश बढ़ रहा था, छात्र आंदोलन उग्र हो रहे थे, और विपक्ष एकजुट होने लगा था। इसी पृष्ठभूमि में सत्ता ने भय को अपना कवच बनाया और संविधान के विशेष प्रावधानों के सहारे देश को असामान्य स्थिति में धकेल दिया। परंतु प्रश्न यह नहीं था कि संकट था या नहीं; प्रश्न यह था कि संकट का समाधान लोकतांत्रिक परंपराओं को कुचलकर क्यों खोजा गया?

उस रात के बाद देश की हवा बदल गई। अख़बारों पर सेंसरशिप की तलवार लटकने लगी। संपादकों को आदेश दिए जाने लगे कि क्या छापना है और क्या नहीं। जिन पत्रकारों ने सच लिखने का साहस दिखाया, उनके स्वर दबा दिए गए। अनेक राजनीतिक नेताओं को रातों-रात गिरफ्तार कर लिया गया। जेलों के दरवाज़े उन लोगों के लिए खोल दिए गए जिनका अपराध केवल इतना था कि वे प्रश्न पूछते थे। लोकतंत्र का सबसे बड़ा अपराधी बन गया था , प्रश्न। और सत्ता का सबसे बड़ा अस्त्र बन गया था चुप्पी!यह समय केवल राजनीतिक दमन का नहीं था, बल्कि मानवीय पीड़ा के चरम का समय था। जेलों में बंद नेताओं, कार्यकर्ताओं, छात्रों और विचारकों पर दबाव डाला गया। परिवार टूटे, बच्चों ने अपने पिता को महीनों नहीं देखा, पत्नियाँ अपने पतियों की प्रतीक्षा में सूखती रहीं, और माताएँ दरवाज़े की ओर टकटकी लगाए बैठी रहीं। कई स्थानों पर यातना, अपमान और भय का ऐसा वातावरण बना कि मनुष्य का आत्मविश्वास ही घायल हो गया। लोकतंत्र रक्षकों के लिए यह केवल जेल नहीं थी; यह विचार की अग्निपरीक्षा थी। वे शारीरिक रूप से बाँधे गए, लेकिन उनकी आस्था को पूरी तरह बाँधा नहीं जा सका।इंदिरा गांधी का नाम इस अध्याय से अलग नहीं किया जा सकता। उनके नेतृत्व में लिए गए निर्णयों ने तत्कालीन सत्ता को तो सुरक्षित करने की कोशिश की, पर देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने को गहरा आघात पहुँचाया। इतिहास यह भी दिखाता है कि सत्ता जब अपने ही भय से संचालित होने लगे, तब वह जनता से दूर और आत्मरक्षा से ग्रस्त हो जाती है। आपातकाल ऐसा ही दौर था, जिसमें राज्य की शक्ति जनता की सुरक्षा के लिए कम और विरोध को कुचलने के लिए अधिक प्रयुक्त हुई। यही वह कारण है कि आपातकाल को केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक नैतिकता की पराजय के रूप में देखा जाता है।इस दौर में सबसे करुण दृश्य वे थे जहाँ साधारण नागरिक भी असुरक्षा का शिकार हुए। किसी की आवाज़ ऊँची थी, तो उसे देशद्रोह का संदेह झेलना पड़ा। कोई छात्र जुलूस में था, तो वह “समस्या” माना गया। कोई शिक्षक लोकतंत्र की बात करता, तो उसे “अवांछित” समझा गया। एक भयावह चुप्पी पूरे समाज पर उतर आई। लोगों ने धीरे-धीरे बोलना कम कर दिया, क्योंकि बोलना जोखिम बन गया था। जब एक राष्ट्र में सत्य को कहना जोखिम बन जाए, तब समझ लेना चाहिए कि केवल शासन नहीं, मनुष्य की आत्मा भी संकट में है।

आपातकाल की सबसे घातक विशेषता यह थी कि वह केवल शरीरों को नहीं, विचारों को भी बंदी बनाना चाहता था। यह सत्ता का वह रूप था जिसमें बाहर की सलाखों से अधिक खतरनाक भीतर का डर था। लोग एक-दूसरे पर भरोसा कम करने लगे, मित्र संदेह की नज़र से देखे जाने लगे, और समाज के भीतर एक अदृश्य दीवार खड़ी हो गई। लोकजीवन, जो लोकतंत्र की असली ताकत होता है, अचानक संकुचित और भयभीत हो गया। गाँव, नगर, विश्वविद्यालय, दफ्तर  हर जगह डर की उपस्थिति महसूस की जा सकती थी। यह डर ही आपातकाल की सबसे गहरी विरासत थी।फिर भी इतिहास केवल दमन का नहीं, प्रतिरोध का भी दस्तावेज़ है। कुछ लोग डरे नहीं। कुछ लोग झुके नहीं। कुछ लोगों ने जेलों में भी अपना विवेक नहीं छोड़ा। वे लोकतंत्र के सच्चे रक्षक थे। उनके लिए जेल अपमान नहीं थी; वह सम्मान का प्रमाण थी। उन्होंने यातना सहकर भी अपनी निष्ठा नहीं छोड़ी। वे जानते थे कि आज अगर चुप रहे, तो कल बोलने की स्वतंत्रता भी नहीं बचेगी। यही लोग बाद में भारतीय लोकतंत्र की स्मृति में अमर हो गए। उनके साहस ने यह याद दिलाया कि सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन सिद्धांत स्थायी हो सकते हैं।आपातकाल का एक और भयावह पहलू यह था कि उसकी मार सबसे पहले और सबसे अधिक गरीबों, वंचितों और कमजोर वर्गों पर पड़ी। बड़े नेताओं की गिरफ्तारी तो समाचार बन गई, पर गली-मोहल्लों में रहने वाले अनगिनत सामान्य लोग अपनी असुरक्षा के साथ जीते रहे। कई जगह जबरन परिवार नियोजन अभियानों ने मानवीय संवेदना को आहत किया। नीति और क्रियान्वयन के बीच की दूरी मिट गई, और मशीनरी ने करुणा खो दी। जब विकास मानवीय गरिमा को रौंदकर आगे बढ़े, तो वह विकास नहीं, अमानवीयता बन जाता है।

यह भी सच है कि आपातकाल केवल एक समय-खंड नहीं था; वह एक चेतावनी थी। उसने भारत को यह सिखाया कि लोकतंत्र केवल चुनाव से नहीं बचता, बल्कि सतत सजगता, स्वतंत्र प्रेस, मजबूत संस्थाओं और नागरिक साहस से बचता है। यदि जनता सो जाए, यदि संस्थाएँ डर जाएँ, यदि मीडिया झुक जाए, और यदि न्याय मौन हो जाए  तो लोकतंत्र कागज़ पर तो रह सकता है, पर जीवन में नहीं। इसी कारण आपातकाल आज भी केवल इतिहास नहीं, एक जीवित सबक है।जिन लोगों ने उस समय यातना सही, उनके चेहरे समय के साथ धुँधले हो सकते हैं, पर उनकी पीड़ा भारत की स्मृति में ज्यों की त्यों दर्ज है। कल्पना कीजिए कोई वृद्ध पिता अपने बच्चे को जेल की खिड़की से देख रहा है; कोई पत्नी वर्षों से पत्र की प्रतीक्षा में है; कोई युवा छात्र अपने सपनों के साथ सलाखों के पीछे है; कोई पत्रकार अपने ही शब्दों से वंचित है। यह केवल व्यक्तिगत दुख नहीं था, यह राष्ट्रीय दुख था। क्योंकि जब एक नागरिक रोता है, तब लोकतंत्र का एक हिस्सा रोता है।आपातकाल का अंत इसलिए महत्वपूर्ण था कि उसने जनता को अपनी शक्ति पहचानने का अवसर दिया। देश ने समझा कि यदि जनता चाहे, तो तानाशाही का चेहरा बदला जा सकता है। 1977 में सत्ता परिवर्तन ने यह सिद्ध किया कि लोकतंत्र की जड़ें गहरी हों तो दबाई जा सकती हैं, उखाड़ी नहीं जा सकतीं। लेकिन इस विजय के साथ एक पीड़ा भी जुड़ी रही  कितने ही लोग अपमान, यातना और भय के बाद सामान्य जीवन में लौटे, पर मन के घाव शायद कभी पूरी तरह नहीं भरे। इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि सत्ता की भूलें अक्सर पीढ़ियों को कीमत चुकाने पर मजबूर करती हैं।आज जब हम आपातकाल को याद करते हैं, तो केवल किसी एक दल, किसी एक व्यक्ति या किसी एक निर्णय की आलोचना नहीं करते। हम उस मनोवृत्ति को चुनौती देते हैं जो सत्ता को जनता से ऊपर मानती है। हम उस भय को अस्वीकार करते हैं जो सत्य को अपराध बनाता है। और हम उन सभी लोकतंत्र रक्षकों को नमन करते हैं जिन्होंने यातना के बीच भी यह विश्वास नहीं छोड़ा कि भारत की आत्मा स्वतंत्र है।आपातकाल का सबसे बड़ा संदेश यही है कि लोकतंत्र को सबसे अधिक खतरा शत्रु से नहीं, बल्कि भीतर के अहंकार से होता है। जब शक्ति विनम्रता खो देती है, तब वह अत्याचार बन सकती है। जब सरकार प्रश्नों से डरने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि शासन भटक रहा है। और जब नागरिक मौन हो जाएँ, तब इतिहास स्वयं उन्हें जगाने के लिए कठोर ध्वनि में बोलता है।इसलिए आपातकाल भारतीय इतिहास का केवल काला अध्याय नहीं, बल्कि चेतावनी की घंटी है। यह हमें सिखाता है कि स्वतंत्रता एक बार पा लेने की वस्तु नहीं, हर दिन बचाने की जिम्मेदारी है। यह हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र केवल संसद की इमारत में नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के हृदय में रहता है जो सच बोलने का साहस रखता है। और यह हमें बताता है कि यातना के अँधेरे में भी जो लोग सत्य के दीपक की तरह जलते रहे, वही वास्तव में राष्ट्र की आत्मा के सच्चे प्रहरी थे।

आज संविधान की हत्या करने वालों के उत्तराधिकारी संविधान की दुहाई देते नहीं थक रहे!

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