मीडिया और वन्देमातरम 101

जब भी भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास लिखा जाएगा, कुछ शब्द ऐसे होंगे जो केवल शब्द नहीं, बल्कि एक युग की चेतना के प्रतीक बनकर सामने आएँगे। "वन्दे मातरम्" ऐसा ही एक उद्घोष है। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि वह मंत्र है जिसने पराधीन भारत में स्वाधीनता की ज्वाला प्रज्वलित की, जिसने क्रांतिकारियों को बलिदान के लिए प्रेरित किया और जिसने करोड़ों भारतीयों के मन में मातृभूमि के प्रति समर्पण का भाव जगाया।बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित "वन्दे मातरम्" के 150 वर्ष पूरे होना केवल एक साहित्यिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय चेतना के डेढ़ सौ वर्षों की यात्रा का उत्सव है। यह वह गीत है जिसे सुनकर अंग्रेजी सत्ता विचलित हो उठती थी, जिसे गाने पर प्रतिबंध लगाने की कोशिशें हुईं और जिसे स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने अंतिम क्षणों तक हृदय से लगाए रखा। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जिस गीत ने राष्ट्र को जगाया, उसके 150वें वर्ष का उत्सव भारतीय मीडिया के बड़े हिस्से के लिए कोई बड़ी खबर नहीं बन सका।
आज का मीडिया चौबीस घंटे सक्रिय है। राजनीतिक बयान, फिल्मी विवाद, सोशल मीडिया की सनसनी, क्रिकेट की चर्चा और मनोरंजन की चकाचौंध लगातार स्क्रीन पर छाई रहती है। लेकिन जब बात राष्ट्र की सांस्कृतिक स्मृतियों, स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत और राष्ट्रीय प्रतीकों की आती है, तो वही मीडिया अक्सर असाधारण उदासीनता का परिचय देता है। "वन्दे मातरम्" के 150 वर्ष पूरे होने जैसा अवसर राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र होना चाहिए था, लेकिन अधिकांश मीडिया संस्थानों ने इसे सीमित औपचारिकता से आगे नहीं बढ़ाया।
प्रश्न यह नहीं है कि मीडिया ने "वन्दे मातरम्" का विरोध किया या समर्थन। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या उसने इस ऐतिहासिक अवसर को उस महत्व के साथ प्रस्तुत किया, जिसका वह अधिकारी था? क्या देश के युवाओं को बताया गया कि यह गीत केवल एक रचना नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम का घोष था? क्या यह चर्चा हुई कि "वन्दे मातरम्" ने भारतीय राष्ट्रवाद को किस प्रकार वैचारिक शक्ति प्रदान की? क्या यह विमर्श चला कि आधुनिक भारत की राष्ट्रीय पहचान में इसकी क्या भूमिका रही है? यदि उत्तर नकारात्मक है, तो यह केवल संपादकीय चूक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्मृति के प्रति उदासीनता का प्रमाण है।राष्ट्र केवल संविधान, सरकार और संस्थाओं से नहीं बनते। राष्ट्र अपनी स्मृतियों, प्रतीकों और सांस्कृतिक चेतना से निर्मित होते हैं। जो समाज अपने राष्ट्रीय प्रतीकों को भूलने लगता है, वह धीरे-धीरे अपनी पहचान से भी दूर होने लगता है। "वन्दे मातरम्" भारत की उसी पहचान का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। यह गीत भारत माता को केवल भौगोलिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक सत्ता के रूप में स्थापित करता है। यही कारण है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह गीत जन-जन की वाणी बन गया।
विडंबना यह है कि आज भारत में राष्ट्रीयता पर बहसें तो खूब होती हैं, लेकिन राष्ट्रवाद के वास्तविक स्रोतों पर चर्चा कम होती है। मीडिया घंटों तक राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप दिखा सकता है, लेकिन "वन्दे मातरम्" जैसे विषयों पर गंभीर विमर्श के लिए उसके पास समय नहीं होता। परिणामस्वरूप नई पीढ़ी अपने इतिहास के उन अध्यायों से अपरिचित रह जाती है, जिन्होंने आधुनिक भारत की नींव रखी।
मीडिया को यह समझना होगा कि उसका दायित्व केवल घटनाओं की रिपोर्टिंग तक सीमित नहीं है। वह समाज की सामूहिक स्मृति का संरक्षक भी है। यदि मीडिया राष्ट्र की आत्मा से जुड़े विषयों को महत्व नहीं देगा, तो इतिहास और वर्तमान के बीच का सेतु कमजोर पड़ जाएगा। "वन्दे मातरम्" के 150 वर्ष केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं थे, बल्कि यह विचार करने का अवसर भी थे कि क्या हम अपनी राष्ट्रीय विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक उसी सम्मान के साथ पहुँचा पा रहे हैं, जिसकी वह अधिकारी है।
कौटिल्य दृष्टि
कौटिल्य ने राज्य की शक्ति में जनचेतना और सांस्कृतिक एकता को अत्यंत महत्वपूर्ण माना था। किसी राष्ट्र की दीर्घकालिक स्थिरता केवल आर्थिक या सैन्य सामर्थ्य से सुनिश्चित नहीं होती; उसके लिए साझा स्मृतियों और राष्ट्रीय भावनाओं का जीवित रहना भी आवश्यक है। "वन्दे मातरम्" ऐसी ही एक राष्ट्रीय स्मृति है जिसने भारत को संघर्ष, बलिदान और स्वाभिमान का पाठ पढ़ाया।
आज आवश्यकता इस बात की है कि मीडिया टीआरपी और तात्कालिक सनसनी से ऊपर उठकर राष्ट्र के सांस्कृतिक आधारों पर भी उतनी ही गंभीरता से चर्चा करे। क्योंकि राष्ट्रों का पतन तब नहीं होता जब उनके शत्रु शक्तिशाली हो जाते हैं, बल्कि तब होता है जब वे अपनी स्मृतियों के प्रति उदासीन हो जाते हैं।
"वन्दे मातरम्" की 150वीं वर्षगांठ पर सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि यह गीत कितना महान है—इतिहास इसका उत्तर पहले ही दे चुका है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारत का मीडिया उस महानता को नई पीढ़ी तक पहुँचाने की अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है? यदि नहीं, तो यह केवल मीडिया की विफलता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विमर्श की भी एक गंभीर कमी है।"
वन्दे मातरम् केवल गीत नहीं, भारत की आत्मा का स्वर है। और किसी भी राष्ट्र के लिए अपनी आत्मा को विस्मृत कर देना सबसे बड़ा संकट होता है।
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