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गुरुवार, 25 जून 2026

वन्देमातरम् : परिवार व्यवस्था और भारतीय सभ्यता(109)

 वन्देमातरम् : परिवार व्यवस्था और भारतीय सभ्यता


"वन्दे मातरम्" केवल एक गीत नहीं, यह भारत की आत्मा का उद्घोष है। यह उस मातृभूमि का वंदन है जिसने संसार को परिवार, संस्कृति, धर्म, दर्शन और मानवता का सर्वोच्च संदेश दिया। यदि भारत की सभ्यता हजारों वर्षों तक आक्रमणों, विपत्तियों और चुनौतियों के बीच जीवित रही है, तो उसके पीछे केवल राजसत्ता या सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि उसकी सुदृढ़ परिवार व्यवस्था रही है।आज जब विश्व का एक बड़ा भाग परिवार विघटन, वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या, मानसिक तनाव और सांस्कृतिक संकट से जूझ रहा है, तब भारत की पारिवारिक व्यवस्था एक बार फिर विश्व के लिए आशा का केंद्र बनती दिखाई देती है।

भारतीय सभ्यता का मूलाधार : परिवार::भारत ने कभी व्यक्ति को समाज की अंतिम इकाई नहीं माना। भारतीय दृष्टि में परिवार ही समाज की मूल इकाई है। यही कारण है कि हमारे यहाँ "मैं" से अधिक "हम" का महत्व रहा है।ऋषियों ने कहा"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव।"यह केवल उपदेश नहीं था, बल्कि जीवन का दर्शन था। माता-पिता को देवतुल्य मानने वाली संस्कृति ने ही ऐसे पुत्र उत्पन्न किए जिन्होंने अपने जीवन का सर्वोच्च आदर्श त्याग और सेवा को बनाया।भगवान राम ने पिता के वचन की रक्षा के लिए राज्य त्याग दिया। श्रवण कुमार ने माता-पिता की सेवा को जीवन का धर्म माना। भीष्म ने पिता की प्रसन्नता के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य स्वीकार किया। ये केवल कथाएँ नहीं, बल्कि भारतीय परिवार व्यवस्था के जीवंत आदर्श हैं।

परिवार : भारतीय संस्कृति का प्रथम विद्यालय::भारतीय परंपरा में परिवार को बच्चे की पहली पाठशाला माना गया है। विद्यालय ज्ञान देता है, किंतु संस्कार परिवार देता है।बच्चा बोलना, चलना, सम्मान करना, प्रेम करना और त्याग करना सबसे पहले परिवार से सीखता है। भारतीय परिवारों में दादा-दादी, नाना-नानी केवल बुजुर्ग नहीं होते, वे पीढ़ियों के अनुभव और ज्ञान के भंडार होते हैं।जब दादी रामायण सुनाती है, नाना महाभारत की कथा कहते हैं, माता करुणा सिखाती है और पिता संघर्ष का पाठ पढ़ाते हैं, तब एक संपूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण होता है।इसीलिए भारतीय सभ्यता में परिवार केवल रक्त संबंध नहीं, बल्कि संस्कारों की निरंतर धारा है।

संयुक्त परिवार : भारत की महान शक्ति::संयुक्त परिवार भारतीय समाज की अनूठी देन है। पश्चिमी समाज जहाँ व्यक्तिवाद पर आधारित रहा, वहीं भारत ने सामूहिकता को महत्व दिया।संयुक्त परिवार में अनेक पीढ़ियाँ साथ रहती थीं। सुख-दुख साझा होते थे। संसाधन साझा होते थे। जिम्मेदारियाँ साझा होती थीं।जब परिवार का कोई सदस्य संकट में पड़ता था, पूरा परिवार उसके साथ खड़ा हो जाता था। यही व्यवस्था समाज को स्थिरता प्रदान करती थी।आज भी गाँवों में अनेक स्थानों पर संयुक्त परिवार भारतीय संस्कृति की जड़ों को सींच रहे हैं।

भारतीय परिवार और नारी की भूमिका::भारतीय परिवार व्यवस्था का केंद्र नारी रही है।भारतीय संस्कृति ने नारी को केवल गृहिणी नहीं माना, बल्कि परिवार की आत्मा माना है।सीता त्याग की प्रतिमूर्ति हैं, सावित्री संकल्प की, अनुसूया तप की, गार्गी ज्ञान की और अहिल्याबाई शासन कौशल की प्रतीक हैं।भारतीय परिवार में नारी केवल संबंधों को जोड़ती नहीं, बल्कि पीढ़ियों को संस्कारित करती है। एक संस्कारित माता संपूर्ण राष्ट्र का भविष्य गढ़ सकती है।नेपोलियन ने कहा था'"मुझे योग्य माताएँ दो, मैं तुम्हें महान राष्ट्र दूँगा।"भारतीय सभ्यता इस सत्य को हजारों वर्षों से जानती रही है।परिवार विघटन और आधुनिक संकट आज तकनीक ने संसार को जोड़ दिया है, लेकिन मनुष्यों के हृदयों को दूर भी कर दिया है।

मोबाइल की स्क्रीन बड़ी हो गई है, किंतु परिवार की बैठक छोटी हो गई है। सोशल मीडिया के मित्र बढ़ गए हैं, किंतु आत्मीय संबंध कम होते जा रहे हैं।वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या, पारिवारिक विवाद, तलाक, मानसिक अवसाद और अकेलापन आधुनिक समाज की बड़ी चुनौतियाँ बन चुके हैं।जब परिवार कमजोर होता है, तब समाज कमजोर होता है। समाज कमजोर होता है तो राष्ट्र की आत्मा भी घायल होती है।भारतीय संस्कृति इस संकट का समाधान परिवार के पुनर्जागरण में देखती है।

वसुधैव कुटुम्बकम् : परिवार से विश्व परिवार तक::भारतीय चिंतन परिवार को केवल घर की चार दीवारों तक सीमित नहीं रखता।हमारे ऋषियों ने कहा वसुधैव कुटुम्बकम्"अर्थात सम्पूर्ण पृथ्वी एक परिवार है।यह विचार केवल आदर्शवाद नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की वैश्विक दृष्टि है। परिवार में जैसे प्रेम, सहयोग, त्याग और सम्मान होता है, वैसे ही विश्व व्यवस्था में भी होना चाहिए।आज जब विश्व युद्धों, आतंकवाद, जलवायु संकट और आर्थिक असमानता से जूझ रहा है, तब भारतीय परिवार दर्शन मानवता को नई दिशा दे सकता है।

भारतीय सभ्यता का अमर रहस्य::यूनान की सभ्यता इतिहास बन गई। मिस्र की प्राचीन संस्कृति संग्रहालयों में सीमित हो गई। रोमन साम्राज्य समाप्त हो गया।लेकिन भारत आज भी जीवित है।क्यों?क्योंकि भारत केवल राजाओं और साम्राज्यों के बल पर नहीं टिका था। भारत की शक्ति उसके गाँवों, परिवारों, मंदिरों, गुरुकुलों और संस्कारों में थी।जब आक्रमणकारियों ने राजमहल तोड़े, तब भी परिवारों ने संस्कृति बचा ली।जब विदेशी शासन आया, तब भी माताओं ने बच्चों को राम और कृष्ण की कथाएँ सुनाकर सभ्यता को जीवित रखा।भारत की वास्तविक शक्ति उसके परिवारों में ही रही है।

युवा पीढ़ी का दायित्व::आज भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाला राष्ट्र है। यह युवा शक्ति यदि अपनी जड़ों से कट गई तो भारत केवल आर्थिक शक्ति बनकर रह जाएगा।लेकिन यदि युवा अपने परिवार, संस्कृति और सभ्यता से जुड़ गया, तो भारत पुनः विश्वगुरु बन सकता है।युवाओं को चाहिए कि वे अपने माता-पिता का सम्मान करें, परिवार के साथ समय बिताएँ, भारतीय ग्रंथों का अध्ययन करें और आधुनिकता के साथ संस्कृति का संतुलन बनाए रखें।आधुनिक बनना आवश्यक है, किंतु अपनी जड़ों को भूल जाना आत्मविनाश का मार्ग है।

वन्देमातरम् का उद्घोष केवल राष्ट्रभक्ति का नारा नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की आत्मा का जयघोष है।जिस भूमि ने हमें जन्म दिया, जिसने हमें परिवार, संस्कार, धर्म, करुणा और मानवता का पाठ पढ़ाया, उस मातृभूमि के प्रति कृतज्ञ होना हमारा परम कर्तव्य है।परिवार बचेगा तो संस्कृति बचेगी। संस्कृति बचेगी तो सभ्यता बचेगी। सभ्यता बचेगी तो राष्ट्र अमर रहेगा।आज आवश्यकता है कि हम पुनः भारतीय परिवार व्यवस्था के मूल्यों को अपनाएँ, माता-पिता का सम्मान करें, बच्चों को संस्कार दें और परिवार को केवल रहने का स्थान नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की प्रयोगशाला बनाएँ।आइए संकल्प लें!"परिवार को सशक्त करेंगे, संस्कृति को सुरक्षित करेंगे और भारत को पुनः विश्वगुरु बनाने में अपना योगदान देंगे।"

वन्दे मातरम्।


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