लोकतंत्र के चरणों में गिरी सत्ता: मंत्री नहीं, नौकरशाही के चरणवंदक!
झांसी,लखनऊयूपी सरकार के मंत्री मनोहर लाल पंथ उर्फ मन्नू कोरी का ललितपुर दौरा किसी विकास, नीति या जनहित के कारण नहीं, बल्कि एक मानसिक दासता के प्रतीक दृश्य के कारण याद किया जाएगा। झांसी मंडल के कमिश्नर द्वारा माला पहनाए जाने के बाद मंत्री जी का अधिकारी के पैर छूने के लिए झुक जाना कोई साधारण शिष्टाचार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं का सार्वजनिक अपमान है।
यह दृश्य बताता है कि सत्ता का केंद्र अब जनता नहीं, बल्कि नौकरशाही बनती जा रही है। लोकतंत्र में मंत्री जनता का प्रतिनिधि होता है, और अधिकारी संविधान के अधीन सेवक—लेकिन यहाँ तो तस्वीर उलटी है। मंत्री स्वयं को अफसर के चरणों में समर्पित कर रहा है। यह सिर्फ एक व्यक्ति की कमजोरी नहीं, बल्कि राजनीतिक वर्ग की आत्महीनता का प्रमाण है।
लोकतंत्र का यह दुर्भाग्य है कि जो जनादेश लेकर आए, वही फाइलों के देवताओं के आगे नतमस्तक दिखें। इससे बड़ा दुर्भाग्य यह कि ऐसे मंत्री लोक साहित्य, लोक परंपरा और जनसम्मान की मूल भावना पढ़ने में विफल रहे। भारतीय लोक संस्कृति में विनम्रता है, परंतु आत्मसमर्पण नहीं; सम्मान है, परंतु संवैधानिक पद की तिलांजलि नहीं।
यह घटना सवाल पूछती है—
क्या मंत्री पद अब केवल नाम का रह गया है?
क्या शासन जनता से नहीं, अफसरों की कृपा से चलेगा?
अगर मंत्री ही अपनी संवैधानिक गरिमा भूल जाएँ, तो फिर आम नागरिक से लोकतंत्र पर भरोसा रखने की उम्मीद कैसे की जाए?
यह पैर छूना नहीं था—यह लोकतंत्र के स्वाभिमान का झुकना था।
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